जीवन चक्र

बुलबुला एक पानी 'जिंदगी सा'
आकर पत्ते पर अटक गया ।
नीचे संसार दरिया पानी का
बुलबुला सोचे मैं कहाँ अटक गया ।।

      हूँ मैं पास इसके पर मिलन नही होता
      बस सोच ही नसीब हो गया ।
      करे क्रीड़ा झोंका हवा का अक्सर
      बुलबुला सोचे मैं कहाँ अटक गया ।।

पत्ता फिरे हवा संग डगर डगर
किस्मत का देखो खेल हो गया ।
अब गिरने से मिलन होगा मगर
बुलबुला सोचे मैं कहाँ अटक गया ।।

      हाय रे किस्मत मीलों से गिरा मगर
      कदमों पर आकर अटक गया ।
      तिल तिल कर धूप 'बेरहमी' ने मारा
      बुलबुला सोचे मैं कहाँ अटक गया ।।

#दिगम्बर डंगवाल


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