पहाड़ों की खेती क्यों हुई बंजर ?
पहाड़ों की खेते सिमटते सिमटते घरों के आँगन तक आ गई और शहरों में जंगल के जंगल आवाद हो गये । कभी सोचा आपने ऐसा चमत्कार कैसे हुआ ? बहुत लोगों ने यह गलत आंकलन अपने दिमाग में बिठा रखा है कि बेरोजगारी सभी कारणों के लिए भागीदार है और दूसरा सुख सुविधाओं का अभाव है । मैं दोनों ही कारणों को पहाड़ों के लिए बहुत जरूरी नही समझता हूँ, हां लेकिन ऐसा भी नही की 10-10 किलोमीटर तक सड़के ही न हों । यह भी गलत ही होगा या था । दरअसल बात यह है कि सुविधाओं का भी वर्गीकरण होना चाहिए था जो सरकारें नही कर पाई और जब सुविधाएं दी तो गलत तरीके से दे दी और यहीं से पहाड़ का पतन शुरू हुआ । सड़क प्राथमिक आवश्यकता थी वह घर घर में होनी चाहिए थी और आज से नही आज से 30 - 40 साल पहले से होनी चाहिए थी और अगर 30-40 साल पहले नही आ सकी तो 2005 तक अधिकांश गावों में हो जानी चाहिए थी । क्या पड़ता इसका फर्क ? सड़क पास होती तो स्कूल 20-20 किलोमीटर से भी अधिक दूरी पर होते तो बच्चे आसानी से जा सकते थे, कोई कभी बीमार हो गया या माताओं के प्रसव के दौरान आसानी से हस्पताल लेजाया जा सकता था, लोग अपना उगाया हुआ अनाज आसानी से बाजार तक ले जा सकते थे । लेकिन ऐसा नही हुआ इसके विपरीत सरकार ने गाँव गांव स्कूल पहले खोले, हस्पताल खोले तो अंजाम क्या हुआ कि बिना सड़कों की सुविधाओं के न वहां शिक्षक पहुंचे न डॉक्टर । आज सड़के दी तो लोग असुविधाओं से इतने भयभीत थे कि उनको शहरों की तरफ भागने का रास्ता मिल गया और इनके आते ही पहाड़ों पर 30% खेती बंजर हो गयी । यह वह तबका था जो समर्थ था और इन घरों में सरकारी सेवाओं में सदस्य थे । 2018 में सरकार ने उत्तराखंड के गांवों का एक सर्वेक्षण करवाया जब उसकी रिपोर्ट आयी तो मेरी आंखे की पुतलियां आंकड़ों को देखकर फैल गयी । आज इस लेख से शायद आपकी भी फैलने लगेंगी । उस रिपोर्ट में आया की उत्तराखंड के 400 से अधिक गांवों में आज 10 नागरिक से भी कम हैं और उनमें से भी अधिकांश वृद्ध लोग हैं । तो ऐसी स्थिति में खेती का क्या प्रतिशत होगा, मुझे लगता है शायद मुझे अब ज्यादा लिखने की जरूरत नही है ।
लेकिन जरूरत तो है क्योंकि इतना कुछ होने के बाद भी, बिना खेती और पशुओं के भी कुछ लोग गांवों में हैं तो आखिर वह लोग वहां क्या कर रहे हैं ? दरअसल कोई भी ग्रामीण समाज तब तक पूरा नही होता जब तक उसके तीन स्तर न हों । पहला है अति गरीब, दूसरा है मध्यम गरीब और तीसरा से मध्यम अमीर । इससे ऊपर का नागरिक ग्रामीण क्षेत्र में न आज रहता है और न आज से 30-40 साल पहले रहता था, राजा महाराज और उनके शागिर्दों को छोड़कर । इसके बाद का दौर आया जब लगभग 70% मध्यम अमीर भी सड़कों के साथ साथ श्रीनगर, ऋषिकेश ,देहरादून व अन्य शहरों की तरफ आ गया लेकिन उसकी खेती मध्यम गरीब या अति गरीब वर्ग करता रहा । आज भी पहाड़ों पर 30% मध्यम अमीर है किन्तु उनके बच्चे वहां नही हैं । यह वह वर्ग है जो पढ़ा लिखा व सरकारी सेवाओं में कार्यरत रहा किन्तु अब सभी 60 वर्ष से अधिक हैं तो खेती की जटिल शैली की वजह से इनकी खेती भी न के बराबर ही आवाद है । अब बात करते हैं पिछले एक दशक की और गांव में रह रहे लोगों के बारे में । आज गाँव के अधिकांश हिस्सों पर मध्यम गरीब वर्ग है और कुछ प्रतिशत अति गरीब वर्ग भी है । लेकिन अब यह वर्ग भी खेती नही करता है और अधिकांश क्षेत्रों की 70% से अधिक भूमि बंजर हो चुकी है, कारण ? कारण है सरकार ! सरकार ने वक्त पर मूलभूत सुविधाएं नही दी तो मध्यम अमीर वर्ग गांव से शहर चला गया और उसके बाद जो लोग खेती कर भी रहे थे तो जंगली जनवरों ( जो खेती को नुकसान करते थे) को मारना गैर कानूनी कर दिया । इससे खेती को नुकसान हुआ तो लोगों ने खेती करना कम करना शुरू किया और राज्य की होनहार सरकार ने घर घर सरकारी राशन भेजना शुरू कर दिया । जब सरकार का इससे भी मन न भरा तो नरेगा शुरू कर दिया जो 2009 में मनरेगा हो गया और लोगों को बैठे बैठे महीने का राशन व 100 दिन का रोजगार मिलने लगा तो लोगों ने सोचा खेती कौन करे । परिणाम यह हुआ कि अधिकांश गांवों का 70% कृषि वाला क्षेत्र बंजर हो गया और आज यह स्थिति हो गयी है कि लोग चाह कर भी बंजर पड़े खेत को आवाद नही कर पा रहे क्योंकि पहाड़ पर खेती करना आसान तो पहले ही नही था और जो खेत पांच वर्ष से अधिक बंजर हो गया हो उसको देखकर तो हौसल ही जवाब दे देता है । अब सवाल यह है कि आखिर लोग पहाड़ों पर खेती करना क्यों चाहते है जब पहले छोड़ चुके थे ? इसका कारण भी सरकार ही है । देखो भाई सीधी सी बात है या तो किसी की फटी में टाँग न डालो और अगर डालो तो या टाँग पूरी घुसा दो या इतनी सहजता से निकालो की अगले को दर्द न हो । सरकार ने पहले लोगों को मुफ्त का खाना व पैसा दिया तो लोगों से गाय,भैंस रखना तक छोड़ दिया अब सरकार ने राशन को दिन बा दिन कम करना शुरू कर दिया और मनरेगा का पैसा वक्त पर मिलता नही । शहरों में बेरोजगारी का आंकड़ा आसमान छूँ रहा है या जिनको रोजगार मिल भी रहा है तो उससे वह कमरे का किराया व खाना पीना ही नही कर पा रहा है । तो सरकार के टाँग पीछे खींचने से अब बहुत दर्द हो रहा है इसलिए लोग वापास लौटना चाहते हैं पर समस्या विकट हो गयी है ।
"निष्कर्ष यह है कि पहली गलती तो सरकारों की है कि उसने पहाड़ के नागरिकों को गलत तरीके से सुविधाए दी और दूसरी गलती नागरिक कर बैठे या कर रहें हैं जिन्होंने सरकारों में बैठे नागों पर यह भरोसा कर लिया कि वह हमारे गले में सुरक्षित लपटे रहेंगे ।'