पहाड़ के लोगों की माँगे ही गलत थी और आज भी वही माँगे दोहरा रहे है लोग ।


पहाड़ी क्षेत्र विकास क्यों नही कर रहे ? यह सवाल विधनसभा में पूछने वाला है । पर शायद ही इस पर कभी चर्चा हुई हो या होती हो और जैसी लोगों की माँगे है उन्हें देख के लगता है कि शायद ही आगे भी कभी होगी । पहाड़ के लोगों ने स्कूल मांगे सरकार ने दे दिए, सड़के मांगी सरकार ने दे दी, हस्पताल मांगे दे दिए और अब भवन बन के खड़े हैं तो लोग खामोश है । कहीं शिक्षक चार हैं कहीं एक है और कहीं कहीं तो भवन भी गिरने वाला है, कई सड़को पर 24 घण्टे में एक ही वाहन निकलता है और हस्पताल डॉक्टरों की राह देखते देखते खुद इलाज मांगने लगे हैं ।  क्या भवन शिक्षा के लिए मुख्य कारक था ? जी नही ! शिक्षा के लिए एक अच्छा शिक्षक मुख्य कारक है । हर 20 किलोमीटर पे स्कूल खड़ा हो जाने से अच्छी शिक्षा मिल जाएगी इस सोच ने पहाड़ पर स्कूलों की संख्या तो बढ़ा दी किन्तु पहले से राज्य में चल रहे शिक्षकों के अभाव को कई गुना बढ़ा दिया । नतीजा यह हुआ कि गुणवत्ता घटती गयी और लोग सरकारों को गलत कहकर पहाड़ से देहरादून की तरफ भागते रहे । यही हाल आज सड़कों के जालों का हो रहा है क्योंकि कई सड़कों पर सिर्फ एक या दो वाहन ही दिन भर में गुजरते हैं और उनका भी अपना कोई निर्धारित समय नही है । इसी तरह चिकित्सा के लिए डॉक्टर जरूरी है न की हर ग्रामसभा में हस्पताल । बात को समझये, हमारी मांगों ने हमें द्वितीय दर्जे की सुविधाएं तो दे दी किन्तु श्रीनगर और श्रीकोट जैसे हस्पतालों में आज भी पूर्ण डॉक्टर नही दिए । नतीजा यह है कि छोटी छोटी समस्याओं के लिए ऋषिकेश या देहरादून आना पड़ता है ।


सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आज भी लोग यही सब मांग रहे हैं । कोई कह रहा है कि हमारी ग्रामसभा को ITI दे दो, कोई कह रहा है पॉलिटेक्निक दे दो, तो कोई कह रहा है हस्पताल दे दो । लेकिन जो पॉलिटेक्निक या ITI या अन्य शिक्षण संस्थान व हस्पताल पूर्व से चल रहें हैं उनमें पूर्ण पाठ्यक्रम या इलाज व अच्छे शिक्षकों और डॉक्टरों की मांग कोई नही कर रहा । कोई भी प्रस्ताव इस पर नही आता की सरकारी बसें श्रीनगर में न खड़ी होकर ग्रामीण क्षेत्रों से पहले श्रीनगर आये और फिर देहरादून व अन्य स्थानों के लिए सवारी लेकर जायें। इससे क्रांति आ जाएगी यह मैं नही कहता किन्तु लोगों को एक व्यवस्थित सुविधा ( जिसका समय निर्धारित होगा ) मिल जाएगी । अब सवाल यह है कि यह जिम्मेदारी है किसकी ? तो पंचायत स्तर पर राज्य सरकार का प्रतिनिधि होता है प्रधान, पहले तो यह समझिए । तो कायदा तो यह बनता है कि अगर प्रधान जागरूक है तो यह निर्माण वह खुद ही ले सकता है कि वह राज्य सरकार को अवगत करवाये, नही तो ग्रामसभा के नागरिक प्रधान को एक ज्ञानपन सौंप सकते है तथा उसके साथ जाकर स्थानीय विधायक से मिल सकते हैं ।  निष्कर्ष यह है कि पहाड़ के विकास की मुख्य बाधा वहीं का नागरिक है । उच्च शिक्षित वर्ग जिसको विश्लेषण का सही ज्ञान है वह या तो पहाड़ पर है नही और अगर कहीं कहीं है भी तो वह चुपचाप है क्योंकि आज हर नागरिक अपने आप को कहीं भी छोटा या कम नही आंकना चाहता है । इसकी दूसरी वजह है कि पढा लिखा वर्ग सम्पन्न भी है और वह बिना पूछे गलत दिशा में बढ़ रहे लोगों को अपनी राय भी देना नही चाहता क्योंकि वह अपने काम किसी भी स्तर पर करवाने में सक्षम है । नेता इस बात को अच्छे से समझते हैं और वह अंग्रेजों वाली नीति अपना के लोगों को पृथक पृथक करने में कामयाब हो गये हैं । 


मुझे तो पिछले एक दशक में एक भी ऐसा आंदोलन या राज्यस्तरीय विचार विमर्श याद नही आता जिसमें स्थानीय लोगों ने पहले से चल रहे शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की मांग का मुद्दा उठाया हो या हस्पतालों में डॉक्टरों की माँग रखी हो या रोजवेज बसों की माँग की हो ? हाँ हाल में ही बढियारगढ़ क्षेत्र ने अपनी मांग रखी है सरकारी बस सेवा हेतु शायद और वह स्वीकृत भी कर दी गयी है ऐसी खबर है । सोचिए टिहरी से श्रीनगर के लिए एक भी सरकारी बस नही है जबकि बीच मे पड़ने वाले गांवों की संख्या भी कम नही है । न ही कोई आज सरकार की मनमानी का विरोध करता है । आज सरकारी बस मलेथा से ऋषिकेश का किराया 170 रुपये लेती है और निजी बसें 140, लेकिन लोगों ने एक बार भी नही पूछा कि ऐसा क्यों ? क्या निजी बसों में तेल की जगह पानी भरा जा रहा है ? नहीं ! इसका कारण है सरकारी बस सेवाओं में पैसे वाले लोगों की भागीदारी, क्या आप जानते हैं कि बसें आम लोगों की हैं और सरकार ने उन पर उत्तराखंड परिवहन लिखा हुआ है जिस बात के वह अपना पैसा खा लेती है और जो उनके मालिक हैं उन्होंने उस पैसे को पूरा करने के लिए किराया बढ़ाया हुआ है । वृद्ध लोगों को मुफ्त सेवा का बहाना लगा कर आम जनता की जेब से सीधे 30 रुपये निकाल लिए गए तो आप सोचिए यह जन हित है या उन लोगों का हित जिनकी बसें हैं उत्तराखंड परिवहन में । पर यह सब मुद्दे ही नही हैं, मुद्दे क्या हैं ? कि सहाब मुझे एक स्कूल की स्वीकृति दे दो, iti की स्वीकृति दे दो, हस्पताल भवन दे दो, पर यह आंकल नही है कि जो पहले से है उनमें कितने शिक्षक या डॉक्टर हैं ।


"आज लड़ाई विचारात्मक न होकर या तो जातिवाद का रूप ले लेती है या भावनात्मक रूप में परिवर्तित हो जाती है।"



UTTARAKHAND LATEST JOBS

Uttarakhand: Assistant and Lower Division Clerk Posts.

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ सॉइल एंड वॉटर कंज़र्वेशन (ICAR IISWC) में असिस्टेंट और लोअर डिवीज़न क्लर्क के 16 पदों के लिए भर्…

Read more »

संपर्क फ़ॉर्म