बरवादी शब्द का जिक्र आते ही मुझे ये खूबसूरत लाइनें याद आती हैं ।
" अजीब हुनर है ये शायरी लिखना भी, मैं अपनी बरवादी लिखूंगा और लोग वाह -वाह करेंगे ।"
कुछ यही हो रहा है उत्तराखंड गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्र के नागरिकों के साथ, आज वह अपनी दुखभरी कहानी किसी को सुनाते भी हैं तो शहरी व्यक्ति उसका उपहास ही करता है । सही शिक्षा नही मिली तो अनपढ़ से बन गये, नौकरी नही मिली तो हल चलाने लगे या पत्थर तोड़ने लगे और जब समझ आने लगा थोड़ा बहुत तो सरकारों ने गांवों के पास दारू के ठेके खुलवा दिए । अब युवाओं के हालत ऐसे हैं कि दो गिलास दारू पीने के बाद शेर बन जाते हैं और जब नशा उतर जाता है तो भीगी बिल्ली । नकारेपन की वजह से अधिकांश युवा अपने मौलिक अधिकारों को ही भूल चुके हैं और इसका सबसे ज्यादा फायदा होता स्थानीय नेताओं को जिनके माकन व दुकान शहरों में हैं । आज मुझे इस लेख पर समीक्षा करनी पड़ रही है क्योंकि जिस चीज को संविधान भी आपात काल में निरस्त नही कर सकता वह सरकारें गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्र से छीनती आ रही हैं । मैं बात कर रहा हूँ "जीने के अधिकार" के बारे में । आपने शिक्षा छीन ली, आपने नौकरी छीन ली, आपने दारू पीला पीला के स्वास्थ्य छीन लिया तो जीने का अधिकार क्या सिर्फ साँस लेने को मान लिया जाय या चलने फिरने भर को जीने का अधिकार मान लिया जाय ? क्या है जीने के अधिकार की परिभाषा नेता जी आपके शब्दों में ? क्या दारू पीकर चिल्लाना, मारपीट करना, नालियों में पड़े रहना जीने का अधिकार है या आधी अधूरी शिक्षा प्रणाली से लाचारी में हल लगाना, पत्थर फोड़ना या दूसरे की गुलामी करना, जीने का अधिकार है । मुझे तो आज की स्थिति को देखर यही लगता है कि यही सब जीने का अधिकार है पहाड़ी नागरिकों का । और अगर यही जीने का अधिकार है तो डोला पालकी प्रथा को क्यों बन्द करवाया गया, क्यों दलितों के लिए कोई एक्ट बनाया गया ? वही व्यवहार आज पहाड़ पर रह रहे सामान्य/असमान्य वर्ग के लोगों के साथ आप कर रहें हैं तो सब सही है । शहरी नागरिक आज उच्च कोटि का हो गया और ग्रामीण पहाड़ी छोटी जात का, क्यों ? मुझे तो यही लगता है । क्योंकि मंत्रियों के भाई/भाभी/पत्नी/बहन और अन्य रिश्तेदार तो नही दिखते पहाड़ी क्षेत्र में शिक्षक, डॉक्टर व अन्य पदों पर तो क्या पहाड़ द्वितीय या तृतीय दर्जे का नही हो गया और आप उस महान ब्राह्मण जैसे हो गये जो छोटी जात के घर खाना तो दूर पूजा भी नही करना चाहता है ।
अब तो लगने लगा है भारत में शिक्षा नीति पूर्ण रूप से विफल ही रही क्योकि पहले लोग अनपढ़ जरूर थे लेकिन सम्वेदनाएँ इतनी मरी नही थी । पहाड़ी क्षेत्र का युवा जिसको मानसिक रूप से सर्वाधिक कुशल माना जाता था आज उसकी मानसिक स्थिति जिस प्रकार से डोल रही है उसको देखकर भयभीत और चिंतित हूँ । एक तो रोजगार नही है ऊपर से आपने उसको दारू की लत डलवा दी । बहुत सारे लोग जो इस दारू व अन्य कारणों से गम्भीर रोग से पीड़ित हैं उनके लिए हस्पताल व्यवस्था ही सुदृढ नही है और आप खामोश देहरादून से युवाओं की बर्बादी का तमाशा देख रहे हैं । खूब देखिए ! क्योंकि आपको अधिकार है । 100 में से 10 मर भी गये तो क्या, आपका वोट प्रतिशत तो कभी नही बिगड़ेगा क्योंकि प्रतिशत आंकड़ा तो जिंदा लोगों का है । अगर सरकार बेमौत मरे लोगों या गांवों को स्थाई रूप से छोड़ चुके लोगों का आंकड़ा गिन लेती तो आप दोबारा नेता ही नही होते । यही दुर्भाग्य है उस पहाड़ पे शिक्षा ले रहे नौजवान का, कि वह आपको अपना नेता मानता है । आज शिक्षा के स्तर को इतना गिरा दिया गया है कि उसको यही नही मालूम की असली कसूरवार कौन है । वह बस यहीं तक सोच सकता है कि शिक्षक या डॉक्टर या अन्य अधिकारी ही उसका कसूरवार है।