एक बार एक नवयुवक ने लगभग दोपहर की धूप में जब पारा लगभग 50 डिग्री से भी ऊपर था, ग्राउंड में फुटबॉल की प्रैक्टिस करने की ठानी। दोपहर के परिश्रम के परिणामस्वरूप उसने कई कैलोरी ऊर्जा खो दी। शाम को जब वह मैदान में बाकी युवाओं के साथ खेल के लिया गया तो खेल के एक चरण में उनकी ऊर्जा कम हो गई। लेकिन, अपनी क्षीण शक्ति को पुनः प्राप्त करने का उनका तरीका अद्वितीय था। उसने पुराने नियम के एक अंश को दोहराया- " वह कुछ गुनगुना रहा था, शायद एक कविता या फिर कोई श्लोक या कुछ और पता नहीं।
क्योंकि मैं कुछ समय से उसको फॉलो कर रहा था तो यह देखकर हैरान था कि उसमें ऊर्जा का एक नया ही स्तर था। हालांकि वह एक युवा था लेकिन जिस गति के साथ उसमें ऊर्जा का निर्माण हो रहा था वह वाकई अद्वितीयक था। जिस व्यक्ति के पास यह अनुभव था, ने मुझे बताया कि अपने आप को वह समझने की क्षमता जो आप चाहते हैं, वास्तव में उसे ताकत का नवीनीकरण हुआ ताकि वह अतिरिक्त ऊर्जा के साथ खेल को पूरा करने में सक्षम हो सके। उन्होंने यह कहकर इस तथ्य को तकनीक रूप से मेरे सामने रखा- "मैंने अपने दिमाग के माध्यम से एक शक्तिशाली ऊर्जा-उत्पादक विचार पारित किया।" हम कैसे सोचते हैं कि हम कैसा महसूस करते हैं, इसका एक निश्चित प्रभाव पड़ता है कि हम वास्तव में शारीरिक रूप से कैसा महसूस करते हैं।
यदि आपका मन आपको बताता है कि आप थके हुए हैं, तो शरीर तंत्र, नसें और मांसपेशियां इस तथ्य को स्वीकार करती हैं। यदि आपका मन अत्यधिक रुचि रखता है , तो आप अनिश्चित काल तक किसी गतिविधि में लगे रह सकते हैं। आध्यात्म हमारे विचारों के माध्यम से कार्य करता है, वास्तव में, यह विचार अनुशासन की एक प्रणाली है। मन को विश्वास की मनोवृत्ति प्रदान करके यह ऊर्जा को बढ़ा सकता है। यह सुझाव देकर कि आपके पास पर्याप्त सामर्थ्य और शक्ति के संसाधन हैं, यह आपको विलक्षण गतिविधि को पूरा करने में मदद करता है। मेरे लिए यह इस तथ्य का एक रहस्योद्घाटन था कि हमारी चेतना में हम असीम शक्ति के एक जलाशय का दोहन कर सकते हैं जिसके परिणामस्वरूप ऊर्जा की कमी को झेलना आवश्यक नहीं है। उदाहरण के लिए इसको ऐसे समझ लीजिए, मान लो आपने दिनभर कुछ ऐसा कार्य किया कि आप शारीरिक रूप से बहुत थके हुए हैं और आप घर आए और फिर बिस्तर पकड़कर लेट गए। आप इतने शक्तिहीन महसूस कर रहे हैं कि आप एक गिलास पानी के लिए भी नही उठ पा रहे हैं। एकाएक आपने देखा कि घर मे आग लग गई है और आप पूरी ऊर्जा से उठे और आग पर काबू पाने के लिए पूरी तरह से प्रयास में जुट गए हैं। सवाल यह है कि आपके अंदर यह ऊर्जा कहाँ से आई ? निश्चित तौर पर कहीं बाहर से तो नही आई।
इस पर वर्षों से मैंने अध्ययन किया है और प्रयोग किया है। जिन विचारों को इस वक्ता ने रेखांकित किया था और जिन्हें दूसरों ने समझाया और प्रदर्शित किया, वह एक चेतना ही है। यह मेरा विश्वास है कि वैज्ञानिक रूप से उपयोग किए जाने वाले आध्यात्म के सिद्धांत मानव मन और शरीर में एक सबल और निरंतर प्रवाह विकसित कर सकते हैं। तेजी से लोगों को यह एहसास हो रहा है कि ऊर्जा और व्यक्तित्व बल का आनंद लेने के लिए एक स्वस्थ आध्यात्मिक जीवन का रखरखाव महत्वपूर्ण है। शरीर को आश्चर्यजनक रूप से लंबी अवधि में सभी आवश्यक ऊर्जा का उत्पादन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यदि व्यक्ति उचित आहार, व्यायाम, नींद, शारीरिक शोषण न करने के दृष्टिकोण से अपने शरीर की उचित देखभाल करता है, तो शरीर आश्चर्यजनक ऊर्जा का उत्पादन और रखरखाव करेगा और खुद को अच्छे स्वास्थ्य में बनाए रखेगा। मनुष्य में ऊर्जा की अपार सम्भावनाये हैं लेकिन वह इस ऊर्जा को अलग अलग क्रियाकलापों में व्यर्थ ही व्यय करता रहता है। ऊपर दिया हुआ उदाहरण यह दिखाने के लिए काफी है कि कैसे आपकी चेतना आपको निर्बल अवस्था मे भी यथा शक्ति ऊर्जावान कर देती है।
यदि मनुष्य संतुलित भावनात्मक जीवन पर समान ध्यान देता है, तो ऊर्जा संरक्षित रहेगी। लेकिन अगर वह एक दुर्बल प्रकृति की वंशानुगत या योगिनी द्वारा थोपी गई भावनात्मक प्रतिक्रिया के कारण ऊर्जा रिसाव की अनुमति देता है, तो उसके पास जीवन शक्ति की कमी होगी। शरीर, मन और आत्मा के सामंजस्य से काम करने पर व्यक्ति की स्वाभाविक स्थिति आवश्यक ऊर्जा के निरंतर प्रतिस्थापन की होती है। श्रीमती थॉमस ए. एडिसन ने उनके प्रसिद्ध पति दुनिया के सबसे बड़े आविष्कारक जादूगर की आदतों और विशेषताओं पर चर्चा एक बार कहा था, कि मिस्टर एडिसन का कई घंटों के श्रम के बाद अपनी प्रयोगशाला से घर में आने की आदत थी और आकर वे अपने पुराने सोफे पर लेट जाते थे। उसने कहा कि वह एक बच्चे की तरह स्वाभाविक रूप से सो जाते थे, पूर्ण विश्राम में व एक गहरी और निर्बाध्य नींद में डूब जाते थे। तीन या चार या कभी-कभी पांच घंटे के बाद वह पूरी तरह से जाग जाता थे, पूरी तरह से तरोताजा हो जाता थे और फिर अपने काम पर लौटने के लिए उत्सुक हो जाता थे।
श्रीमती एडिसन से जब यह पूछा गया कि आप यह सब किस प्राकर देखतीं है कि एक व्यक्ति हर दिन वही प्रक्रिया दोहरा रहा है और खुद को कम समय मे तरोताजा अवस्था मे रखे हुए है ? तो उन्होंने कहा कि , "वे प्रकृतिक आदमी थे," जिसके द्वारा उसका मतलब था कि वह पूरी तरह से प्रकृति और आध्यात्म के साथ सामंजस्य में थे। उनमें कोई जुनून नहीं था, कोई अव्यवस्था नहीं थी, कोई संघर्ष नहीं था, कोई मानसिक विचित्रता नहीं थी, कोई भावनात्मक अस्थिरता नहीं थी। उन्होंने तब तक काम किया जब तक उन्हें सोने की जरूरत नहीं पड़ी, फिर वह चैन की नींद सो जाते और उठकर अपने काम पर लौट जाते।
वह कई वर्षों तक जीवित रहे, और सिर्फ जीवित ही नही रहे बल्कि अमेरिकी महाद्वीप पर जन्म लेने वाला अब तक का सबसे रचनात्मक दिमाग भी रहे। उन्होंने अपनी ऊर्जा भावनात्मक आत्म-निपुणता, पूरी तरह से आराम करने की क्षमता से प्राप्त की। ब्रह्मांड के साथ उनके आश्चर्यजनक रूप से सामंजस्यपूर्ण संबंध ने प्रकृति को अपने गूढ़ रहस्यों को प्रकट करने के लिए प्रेरित किया। ऐसे अनेक उदाहरण आपके आसपास कई सारे विद्यमान हैं। कई ऐसे लोग जो अनिवार्य रूप से धर्मपरायण लोग नहीं रहे हैं, लेकिन भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से वे हमेशा असाधारण रूप से अच्छी तरह से संगठित रहे हैं। यह भय, आक्रोश, माता-पिता के दोषों का प्रक्षेपण, आंतरिक संघर्ष और जुनून होते हैं जो सूक्ष्म रूप से समान प्रकृति को संतुलित करते हैं, इस प्रकार प्राकृतिक बल के अनुचित व्यय का कारण बनते हैं। यही वह अवस्था होती है जब आपको निर्बल अवस्था मे भी अपना अहित नजर आते ही एक अद्वितीयक ऊर्जा का सहारा मिल जाता है। यह प्रत्येक मनुष्य में होती है लेकिन इसका सद्पयोग कैसे होगा, यह कम ही लोग समझ पाते हैं।
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