उत्तराखंड स्कूल व्यवस्था :- उत्तराखंड राज्य निर्माण से पहले यानी 9 नवम्ब 2000 तक यहां की शिक्षा व्यवस्था उत्तर प्रदेश राज्य से संचालित की जाती थी तथा पहाड़ी क्षेत्र में शिक्षा मुहैया करवाने वाला बोर्ड भी उत्तर प्रदेश ही था, हालांकि शहरों (मैदानी इलाकों) में उस वक्त भी दूसरे बोर्ड शिक्षा का माध्यम थे । पहाड़ में शिक्षा की शैली मूलतया हिंदी थी जो आज तक बनी हुई है । लेकिन तब मे और आज मे स्कूलों की हालत में जमीन आसमान का फर्क नजर आने लगा है । एक तरफ सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या गिरती जा रही है दूसरी ओर निजी स्कूल अपने पाँव पसारते जा रहे हैं और उनके पास छात्र संख्या भी कम नही है । तो इसकी वजह क्या है ? क्या यह मान लिया जाय कि सरकारी अध्यापकों में पढ़ाने की काबिलियत नही बची ? या फिर लोग हिंदी भाषा से अपने बच्चों को पढ़ाना नही चाहते ? आखिर वजह क्या है ? तो इसका जवाब है, शिक्षकों में कोई कमी नही है और न ही लोग अपने बच्चों की हिंदी माध्यम से पढ़ाना नही चाहते हैं । क्योंकि अगर ऐसा होता तो सबसे पहले शहर में चल रहे सरकारी स्कूल बन्द होने लगते ।
कहाँ हुई बड़ी चूक:- पूर्ण राज्य की माँग थी सबसे बड़ी भूल । 6 मई 1937 को जबसे अलग राज्य की मांग उठी उसके बाद से राज्य की बहुत सारी व्यवस्थाओं पर उसका क्या असर पड़ेगा यह तत्कालीन राजनेताओं ने नही सोचा । उत्तर प्रदेश से राज्य को अलग करने वालों की माँग थी कि मेरठ या लखनऊ में बैठे लोग पहाड़ की सही देख रेख नही कर सकते । क्योंकि उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि स्थानीय लोगों तक सुख सुविधाओं का सुचारू रूप से संचालन उत्तर प्रदेश से नही किया जा सकता था । लेकिन वह लोग यह भूल गए कि राज्य के निर्माण में कितना धन बर्वाद होगा और उसका व्यवस्थाओं पर क्या असर होगा । नौजवान राज्य के अंतर्गत क्या करेंगे जब राज्य में लघु व माध्यम उद्योग है ही नही , आज की स्थिति जो है यह कभी नही होती अगर चन्द लोग अपना राजनैतिक फायदा नही सोचते ।
क्या होना चाहिए था :- इस राज्य को संघीय (केंद्र शासित) होना चाहिए था । वजह क्या थी केंद्र शासित की ? जब राज्य उत्तर प्रदेश से अलग हुए तो उत्तर प्रदेश द्वारा इस राज्य पर करोड़ो का बकाया था जो आज तक चुकता नही किया जा सका ,इसका सीधा सीधा असर पड़ा विकास कार्यो पर । दूसरा राज्य भ्रष्टाचार मुक्त होता तो केंद्र द्वारा खर्च की गई राशि का पूर्ण व सही इस्तेमाल होता । तीसरा सरकारी संस्थानों की बड़ी जवाब देहि होती जो आज नही है ।
दम तोड़ते सरकारी स्कूल क्यों बने है लाचार:- सवाल यही है कि आखिर जब संचालन उतर प्रदेश से था उस वक्त भी पहाड़ के स्कूलों के हालात इतने दैनीय नही थे । फिर पिछले एक दशक में क्यों लड़खड़ा गए पहाड़ी क्षेत्र के स्कूल ? वजह जानकर शायद आप भी हैरान व परेशान हो जाएंगे क्योंकि अगर आज भी सरकार चाहे तो सरकारी स्कूल पहली पसन्द बन सकते हैं । हुआ क्या ? न तो सरकारी शिक्षकों में कोई कमी है , न ही हिंदी माध्यम कोई समस्या है । समस्या यह है कि सरकार की नीति ठीक नही है , ऐसा भी नही है कि सरकार पैसा खर्च नही कर रही है किंतु सही जगह खर्च नही कर रही इस वजह से स्कूल दीन हीन अवस्था मे आ गये । सरकार ने पहले से चल रहे स्कूलों में विषय न बढाकर 20-20 km पर नए स्कूलों का निर्माण किया जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पहले ही तो पहाड़ो से पलायन हो चुका है और जो लोग रह भी गए हैं वह कुछ इधर बंट गए कुछ उधर बंट गए । सरकार को चाहिए था कि वह पहले से चल रहे स्कूल में अध्यापकों की संख्या बढ़ती और हर विषय को वहां उपलब्ध करवाती जिससे बच्चा बाहर पढ़ने न जाए और जितना पैसा सरकार ने नये भवन निर्माण पर बरबाद किया उससे दूरस्थ बच्चों के लिए स्कूल बस का प्रबंध करती । इससे न केवल छात्र संख्या बढ़ती अपितु लोगों का रुझान सरकारी स्कूलों की तरफ पुनः स्थापित होता । लेकिन सरकार की गलत रणनीति ने न केवल आम जनता का पैसा बरबाद किया साथ ही लोगों को पहाड़ो से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया ।