प्रेम और मोह में क्या अंतर है ? आप किस प्रकार से जीवन निर्वाह कर रहे हैं ।

प्रेम और मोह एक ऐसा विषय है जिसमें 99% मनुष्य फर्क कर पाने में या तो असमर्थ है या वह मोह को ही प्रेम मानकर जीवन पूर्ण कर लेता है। जबकि सच्च इसके ठीक विपरीत है, हाँ इसको छोड़पाना इतना आसान नही लेकिन आमतौर पर मनुष्य मोह में ही जीवन जी रहा है। इससे पूर्व एक लेख में हमने समझा था कि उम्मीदें हमारे दुःख का कारण हैं। अगर आपने वह लेख नही पढा तो आपको इसे पढ़ने से वह अवश्य पढ़ना चाहिए। यहां क्लिक कर वह लेख पढ़ सकते हैं। दरअसल, उम्मीदें भी एक प्रकार से मोह ही है भले हम जीवन की निर्भरता के अनुरूप उनको प्रेम समझ बैठे हैं। इस संसार मे लोग प्रेम बहुत कम ही करते हैं और जिसको प्रेम समझ रहे हैं वह एक ऐसा मोह है जिसमें किसी न किसी प्रकार की निर्भरता है। अभी आपको सब कुछ स्पष्ट नजर नही आ रहा होगा कि ऐसा क्यों ? चलिए आगे तथ्यों के साथ समझ लेते हैं कि ऐसा क्यों है कि लोग प्रेम नही बल्कि मोह से जुड़े हुए हैं।


मोह में अंतर का स्पष्टीकरण कैसे करें ?

इस संसार मे जीवन चक्र एक ऐसी अदृश्य शक्ति से संचालित है जिसमें जन्म और मृत्यु दोनों पर ही किसी जीव का वश नही हैं। जीव केवल माध्यम हो सकते हैं किसी के जन्म का लेकिन जन्म कौन लेगा, उसकी प्रकृति क्या होगी, उसका जीवन कैसा चलेगा, वह कब मरेगा इत्यादि किसी भी जीव के वश में नही होता है। लेकिन जैसे ही कोई जीव जन्म लेता है, उससे उसको जन्म देने वाले माता पिता कि भावनाएं जुड़ जाती हैं। यह केवल मनुष्य में होने वाला प्रक्रिया नही है बल्कि धरती पर तमाम जीव इस प्रक्रिया का हिस्सा है। क्या यहाँ से मोह शुरू हो गया ? उत्तर है, नहीं ! यहां जीव की उम्मीदों का जन्म होता है। यह सभी जीवों में होता है लेकिन केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसकी उम्मीदें मोह तक का सफर तय करती हैं। जबकि, बाकी जीवों में जन्म के कुछ समय बाद ही यह सिलसिला खत्म हो जाता है और वह स्वतंत्र जीवन के रास्ते पर बढ़ने लगते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नही है कि उनमें उम्मीदें खत्म हो जाता है, कुछ पलों के लिए उनमें उम्मीदें फिर से पैदा होती हैं और वह भी घर घोषले बुनते हैं लेकिन वह इसमें लिप्त नही रहते हैं। जबकि अपनी प्रजाति के लिए मुनष्य से अधिक अन्य जीवों में प्रेम/स्नेह देखने को मिलता है।


स्नेह/प्रेम क्या है और यह मोह से किस प्रकार भिन्न हैं ?

स्नेह/प्रेम अगर किसी स्वरूप में होता है तो उसमें उम्मीदों के लिए कोई स्थान नही हो सकता है। अधिकांशतः मनुष्य आज प्रेम शब्द का स्तेमाल केवल उन विषय या वस्तुओं के लिए सही कर पता है जिनका भौतिक स्वरूप नही है या निर्जीवता स्वरूप है। जैसे ईश्वर प्रेम, भक्ति प्रेम । उम्मीदें तो यहां भी जुड़ी हुई है लेकिन बदले में आप कोई भौतिक रूप से लेन देन नही कर सकतें हैं। आप सिर्फ यथासंभव दे ही सकते हैं, सामने से आपको केवल अप्रत्यक्ष आनन्द की अनुभूति हो सकती है इससे ज्यादा कुछ नही। कुछ मनुष्य इस प्रेम में लिप्त हो सकते हैं लेकिन वह मोह कैसे करें ? न तो कोई स्वरूप है न कोई बोलचाल। कुल मिलाकर इसमें किसी प्रकार की शर्त नही है आप जो कर रहें है स्वेच्छा से, न किसी ने आपसे मांगा और न आपको कोई भौतिक रूप से कुछ देने वाला है। इसलिए यह एक तरह का प्रेम ही है लेकिन इसमें उम्मीदें हो भी सकती हैं और नही भी लेकिन मोह इसमें नही है क्योंकि या तो आप क्षणिक समय मे खुद को पृथक कर लेते हैं या फिर जीवनभर बिना किसी निर्भरता के भक्ति में लीन रहते हैं। अब सवाल यह है कि क्या ईश्वर मार्ग मोह रहित है ? इसका जवाब हाँ भी हो सकता है और नही भी, यह शर्त सिर्फ मनुष्य के लिए लागू होती है। क्योंकि मनुष्य में उम्मीदें अन्य जीवों के मुकाबले अधिक प्रबल और स्वार्थमयी होती हैं। इसलिए यह मनुष्य की प्रवृति पर निर्भर करता है कि वह इस मार्ग को मोहयुक्त बनाना चाहता है या मोह हीन।


मनुष्य मोह में कैसे फंस गया ? 

यह तो स्पष्ट हो गया है कि यदि आप किसी से प्रेम करते हैं तो आप उससे अपनी इच्छाओं की पूर्ति की उम्मीद नही बांधे रख सकतें हैं। प्रेम करने वाले को आप उसके कल्याण मार्ग पर चलने का ज्ञान तो दे सकते हैं लेकिन बदले में आप उससे किसी प्रकार के लाभ की उम्मीदें नही बांध सकते हैं। उदाहरण के लिए माता-पिता पुत्र/पुत्री को केवल निष्ठ कर्मों की शिक्षा दें तो यह प्रेम है लेकिन उसके लिए जुड़ते जाएं और सोचे कि इसके लिए किसी प्रकार की कमी न हो और वह बदले में उनसे दूर न हो, तो यह मोह है। क्यों ? क्योंकि इसमें भौतिक लेनदेन है। ऐसा ही करो इसके लिए तैयार किया जा रहा है। आज इस धरती पर  माता-पिता पुत्र/पुत्री से,  पति-पत्नी एक दूसरे से और मनुष्य, मनुष्य से प्रेम नही बल्कि मोह की डोर से बंधा हुआ है। जो पत्नी आपके कुल के लिए संतान न दे सके आज वह प्रेम योग्य नही, क्यों ? क्योंकि उसने आपकी उम्मीद पूरी नही की। जबकि वह हर प्रकार से निष्ठ भाव से सेवा में जुड़ी हुई है। यहां प्रेम का मतलब संतान प्राप्ति से जुड़ जाता है। जो बच्चा माता-पिता की न सुने और अपने पथ पर निष्ठ भाव से आगे बढ़े, वह भी प्रेम योग्य नही, क्यों ? क्योंकि वह आपके भौतिक सुखों को पूर्ण करने के लिए आपके पास नही है। जबकि उसको अपनी जिम्मेदारियों का पूर्ण एहसास है। यहां प्रेम का मतलब एक बंधन हैं।


सच्चा प्रेमी कौन है, क्या रिश्तों में प्रेम स्थापित हो सकता है ?

प्रेम उस वक्त तक स्थापित नही हो सकता जब तक उसमें शर्त है। आज जरूरत है मोह को कर्तव्य से जोड़ने की। इस धरती पर सिर्फ कर्म ही सबसे बड़ा है। यहां हर जीव अपने अपने कर्म पूरे करता है। इसलिए मनुष्य को भी जीवन की हर क्रिया में भागीदार होना चाहिए लेकिन उसमें सिर्फ उसका कर्तव्य जुड़ा हो न कि मोह। उदाहरण के लिए आपको सन्तान चाहिए इसके लिए दो मनुष्यों का मिलन जरूरी है, यह कर्तव्य है। लेकिन, आपको हर दिन मिलन करना है और इसके लिए इच्छाएं प्रबल हैं यह मोह है क्योंकि इसमें उम्मीदें हैं मिलन की।  इसी प्रकार जब आप सन्तान का लालन पालन करते हैं तो उसको कर्तव्य समझे, न कि यह मोह लेकर लालन पालन करें कि आप जितना अच्छा करेंगे वह भी वही करेगा। यहां आप एक ऐसे सुख की कल्पना करने लगते हैं जो आपके हाथ मे नही है लेकिन फिर भी आप उसको लेकर परेशान रहते हुए मोह में पड़े रहते हैं। यहां जरूरत सिर्फ इतनी है कि आप सन्तान को निष्ठ कर्तव्य की शिक्षा दें। ऐसा प्रेम जिसमें आप सीमाएं बना देते हैं वही मोह है। मोह में शिकायतें होती हैं जबकि प्रेम में आपके पास शिकायत नही होती है। उदाहरण के लिए यदि आपको मुझसे किसी प्रकार का भौतिक सुख चाहिए और वह आपको नही मिल रहा है तो आपकी भावनाएं मेरे लिए ऐसी होगीं कि जिंदा तो है पर जो चाहिए वो मिल नही रहा है। जबकि अगर आप मुझसे स्नेह/प्रेम करते हैं तो आपको यह देखकर ही वह प्रेम मिल जाता है कि मैं सकुशल हूँ। इस प्रकार की उम्मीदें (मोह) दुःख का कारण बन जाती हैं।

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