डोला पालकी प्रथा


डोला व पालकी प्रथा उत्तराखंड के गढ़वाल मण्डल में विवाह कार्य में दुल्हन तथा दूल्हे को एक स्थान से दूसरे स्थान (अर्थात मायके से ससुराल) ले जाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है । उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र टिहरी में डोला पालकी नामक आन्दोल भी बहुत प्रसिद्ध हुआ है । इस आन्दोल को दलित (हरिजन) समाज से किया था । उस वक्त में जातिगत भेद भाव के चलते दलित समाज पर डोला-पालकी को अपने विवाह कार्य में उपयोग करने पर प्रतिबन्ध था । इसको केवल स्वर्ण जाती के लोग ही विवाह में ला और लेजा सकते थे । दलित समाज ने इस कुरीति का पुरजोर विरोध किया और इसको एक जन आंदोलन में बदल कर इस कुप्रथा को बन्द करने की मांग की । समाज में सबको समानता का अधिकार है तो फिर लकड़ी से बनी वस्तु से कैसे एक वर्ग वंचित रहता । इस लिए यह घटना गढ़वाल मण्डल की प्रमुख और प्रसिद्ध घटनाओं में सुमार है ।


डोला तथा पालकी दोनों ही लकड़ी से निर्मित होते हैं । डोला दुल्हन को उसके मायके से ससुराल ले जाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है तथा पालकी में दुल्हे को बिठाकर लड़की के यहां विवाह के लिए ले जाया जाता है । डोला/डोली में जब लड़की मायके से ससुराल आती है तो डोला उसके ससुराल पक्ष का ही हो जाता है जबकि पालकी बारात के साथ ही वापस आ जाती है । यह प्रथा गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत प्रसिद्ध हुई क्योंकि प्राचीन समय में एक जगह से दूसरे जगह जाने के लिए सड़के नही थी । वक्त के साथ साथ पालकी की जगह घोड़े ने लेली और लोग दूल्हे के लिए पालकी की जगह घोड़े का प्रयोग करने लगे और पालकी की प्रथा लगभग बन्द ही हो गयी है । लड़की को लाने में उपयोग में आने वाला डोला आज भी पहाड़ी क्षेत्रों दिया जाता है लेकिन बहुत ही कम । आज पहाड़ों पर भी हर गाँव को सड़क से जोड़ दिया गया है, गाड़ियों की सुगमता प्राप्त होने के कारण अब इस प्रथा पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं ।

आने वाले वक्त में शायद यह प्रथा भी दम तोड़ दे । क्योंकि अब यह प्रथा कुछ जगाहों पर सिर्फ लड़की के विवाह में डोला के होने की अनिवार्यता के कारण बची हुई है । डोला होने के बाद भी अधिकांश लड़कियां उसमें बैठती ही नही है या केवल एक दो फोटो खिंचवाने हेतु बैठकर उतर जाती है । ऐसे में डोला अधिक देर तक अपना अस्तित्व बचाये रहेगा, कहना मुश्किल है । बहू के घर से आया डोला ससुराल पक्ष पुनः अपनी बेटी के विवाह में दे देते हैं । अगर उनको पुत्री न हो या पूर्व में ही विवाह हो गया हो तो ऐसा व्यक्ति डोला गाँव में किसी दूसरे व्यक्ति जिसकी पुत्री विवाह योग्य हो, को दे देता है । इस प्रकार यह प्रथा चली आयी है पहाड़ों पर । शहरों में इसकी जरूरत बहुत पहले ही खत्म हो चुकी थी, हाँ जो शहरी लोग आज भी ग्रामीण क्षेत्रों से पहाड़ की बेटियों को बहू स्वरूप ले जाते हैं उनको कभी कभी डोला मिल जाता है । क्योंकि कुछ जगहों पर डोले को लड़की के विवाह की अनिवार्यता समझा जाता है । जिसके बारे में मैंने ऊपर पहले ही लिखा था । तो इस प्रकार उत्तराखंड पहाड़ों की बहुचर्चित प्रथा डोला पालकी भी अपने अंतिम दौर से गुजर रही है ।

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