उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र पर गोरखाओं का पुनः स्थापन का दौर कैसे हुआ सम्भव ?


गोरखाओं ने 1790 में कुमाऊँ पर कब्जा किया और उसके बाद 1791 में गढ़वाल पर धावा बोल दिया लेकिन गोरखाओं को हरा के वापस खदेड़ा दिया गया। 1803 में उत्तराखंड का गढ़वाल क्षेत्र भूकम्प से त्राहिमाम हो गया और यह देख नेपालियों ने पुनः गढ़वाल क्षेत्र पर आक्रमण कर दिया । 14 मई 1804 को प्रधुम्न शाह ने देहरादून के खुडबुड़ा मैदान में निर्णायक युद्ध में अपने प्राणों की आहूति दे दी और तद्पश्चात 1804 से 1814 गोरखाओं का शासन काल रहा । इसके बाद 1814 में सुदर्शन शाह ने अंग्रेज गवर्नर लॉर्ड हेस्टिंग्स से मदद मांगी और 1815 की शुरुआत में अंग्रेजो ने गोरखाओं को वापस खदेड़ दिया । लेकिन युद्ध पर खर्च हुई 7 लाख राशि न चुकाने के चक्कर में अंग्रेजो ने श्रीनगर पर कब्जा जमा दिया और चाँदपुर गढ़ ( गैरसैंण) से आया परमार वंश ( जिसको दिल्ली के शासक बहलोल लोद्दी के द्वारा शाह की उपाधि दी गई और तब से शाह हो गये) को त्रिहरी (आज का टिहरी) में अपना साम्राज्य स्थापित करना पड़ा था । इनके ही तीन बेटे हुए नरेन्द्र शाह ( नरेन्द्रनगर को अपनी राजधानी बनाया ), प्रताप शाह ( प्रताप नगर को अपनी राजधानी बनाया) , कृतिशाह ( कृतिनगर को अपनी राजधानी बनाया ) इसी वंश के अंतिम राजा मानवेन्द्र शाह हुए जो गढ़वाल के राजा रहे ।

यह तो वह जानकारी है जिसने उत्तराखंड में अंग्रेजो को पाँव पसारने का मौका दिया किन्तु उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिन गोरखाओं ने पहाड़ियों पर अत्याचार किए वही आज पहाड़ पर आके पुनः बस गये । और उससे भी बड़ा सवाल की जिनके वजह से हमने अपना राजा और न जाने कितने सैनिक खो दिए वही लोग आज देहरादून के स्थाई निवासी हो गये । क्या यही है नेताओं का राजधर्म ? क्या तुम भूल गये कि तुम किस राज्य के उत्तराधिकारी हो ? अरे तुमसे अच्छा शासन तो तब था जब राज्य उत्तरप्रदेश अधीनस्थ था । कम से कम गोरखाओं के पैर इतने मजबूत तो नही थे । राजा का फर्ज क्या है ? अपने नागरिकों की रक्षा और बाहरी लोगों से अपने राज्य को बचाना जो आज भी लागू है भले राज्य में राजा प्रथा का अंत हो गया और संविधान स्थापित हो गया । देश का नागरिक तक तो संविधन क्षेत्र में संवैधनिक तरीके से एक राज्य से दूसरे राज्य तक ठीक है किन्तु विदेशी नागरिक वह भी असंवैधानिक तरीके से और ऊपर से वह जिसके पूर्वजों ने तुम्हारे राज्य के लोगों का कत्लेआम किया हो, उन्ही लोगों के गांव के गांव बस जाए और राज्य का एक नही आठ राजा सोए रहे । इससे निंदनीय क्या होगा आप सोचिए ? सोचिए कि एक बार को अपनी ही जमीन के लिए यह शाबित करना पड़ जाए कि यह जमीन मेरी थी ? क्या वह दौर याद नही आता जब सिर्फ 7 लाख की मदद में पूरा राज्य टिहरी भर में सिमट गया था वह भी उन लोगों के रहते जो जान देने से नही डरते थे । और इस बात कि क्या प्रतिबद्धता है कि ऐसा नही होगा ? देहरादून में जितनी अवैध कालोनियां बनी है सब वोट बैंक के चक्कर में ही तो बनी , लोगों ने न नदी छोड़े न नाले और आज जब हाई कोर्ट कह भी रहा है कि उनको वहां से हटाया जाय तो नेता अपने वोट बैंक के चक्कर में चुप चाप बैठें हैं । आज इनको बसने दीजिए कल रोहिंग्या मुसलमान को बसा दीजिएगा क्योंकि रेल सेवा के साथ उनकी भी सेवाएं शुरू हो जाएंगी और पहले वह सड़क किनारे बैठेंगे फिर धीरे धीरे घास फूस का घर बनाएंगे और एक दिन नेता जी वोट मांगने जाएंगे और पक्के मकान का आश्वासन देकर चले आएंगे । 

विषय बहुत गम्भीर है क्योंकि भारत गृहयुद्ध की तरफ अग्रसर है । अव्यवस्थाओं का जाल बुनते बुनते अब नेता भी उलझते हुए नजर आ रहे हैं । यही कारण है की भारत अग्रगामी न होकर पुरानी नीतियों में सुधार में ही उलझने लगा है । कहीं पहाड़ भी उसी नीति का शिकार न हो जाए इसलिए इस विषय पर हमें समीक्षा में लेख लिखना पड़ा ।


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