आरक्षण क्या है और आज लोग क्यों चाहते हैं कि आरक्षण खत्म हो ?
आज जिस आरक्षण को देखकर सामान्य जातियों वाले वर्ग नफरत करते है कभी उसकी इतनी आवश्यकता आ गयी थी कि अगर नही लागू किया जाता तो भारत से दलित समाज शायद खत्म हो जाता । सोचिये कि आपके बीच में रह रहा एक समुदाय ऐसा है जिसके हाथ का पानी,खाना और तो और उसकी परम्पराओं को सवर्ण के तरीके से निर्वाह करने पर भी समाज के एक वर्ग को पाप लगता रहा हो / है और वह आपके बराबर में नही बैठ सकता हो,तो वह वर्ग आपके बीच में किस तरह से अपना हक माँगे । दलित कह कर/ समझ कर कोई आपकी बहन बेटियों के साथ गलत व्यवहार करे तो आप क्या करेंगे ? आज भी उत्तर प्रदेश में दलितों पर कई प्रतिबंध हैं । सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में हैं यह इस लेख का कहना बिल्कुल नही है किन्तु अगर 5% भूभाग पर भी है तो सोचिये वह समाज कैसे रहता होगा इस 20वीं-21वीं सदी के भारत में । उत्तराखंड टेहरी में ही दलितों को शादी में प्रयोक्त होने वाले डोला/पालकी जो की लकड़ी से निर्मित होते है और दूल्हे/दुल्हन को लाने लेजाने के लिए उपयोग में लाये जाते है, का दलित समाज उपयोग नही कर सकता अथवा प्रतिबंध था और उनको इसके लिए आंदोलन करना/लड़ना पड़ा था । ऐसी कई अव्यवस्थाओं ने आरक्षण को जन्म दिया । गाँधी जी को इस विशेष वर्ग को बचाने के लिए " हरिजन" नाम देना पड़ा और समाज को समझाया कि ये लोग भी उसी ईश्वर के बेटे है/ उसी हरि के जन है जिसके सभी लोग है और उनके उत्थान हेतु हरिजन समाचार पत्र भी प्रकाशित करना पड़ा । आज भले लगता है कि आरक्षण बहुत गलत निर्णय था लेकिन एक बुद्धिजीवी सवर्ण वर्ग आज भी इस समाज में जिंदा है जिसको मालूम है कि आरक्षण की क्या भूमिका रही है और उसकी जरूरत क्यों पड़ी।
★आरक्षण क्यों आया ?
आरक्षण एक वर्ग को समाज में अन्य वर्गों से उसकी बराबरी हो सके इसलिए आया । बराबरी का मतलब था कि आर्थिक बराबरी हो, रीति रिवाजों में बराबरी हो, नौकरी पेसे में बराबरी हो ।
★क्या आवश्यता थी बराबरी की ?
आवश्यकता थी कि हरिजन वर्ग सामान्य वर्ग के बराबर में बैठ सके, आवश्यकता थी कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग ऊपर उठ सके, आवश्यकता थी कि उसको इंसान समझा जाय और आवश्यकता थी कि उसको गुलाम न समझा जाय ।
★क्या आरक्षण गलत था या है ?
नही! आरक्षण न गलत था न है ।आरक्षण वक्त की मांग थी और कुछ जगहों पर आज भी है लेकिन सभी रूप से सशक्त होकर भी आरक्षण को अपना अधिकार मानना और आर्थिक रूप से सशक्त होकर भी आरक्षण का उपयोग करना, समाजिक हित में एक तरीके का धीमा जहर है ।
आरक्षण जिस सिद्धान्त के तहत लाया गया था वह गलत नही था लेकिन वक्त के साथ साथ लोग इसको राजनीति का हतियार बना बैठे और स्थिति विपरीत हो गई । आरक्षण योग्यता पर भारी पड़ने लगा और सवर्ण आरक्षण की भड़कती लौ से झुलसने लगे । दूसरा जिन लोगों ने आरक्षण के दम पर उच्च पद हासिल किये उन्होने आरक्षण का कहीं न कहीं दुरुपयोग किया । यह लेख यह नही कहता कि वह कुशल व्यक्तित्व के नही थे किन्तु उन्होंने आरक्षण की आड़ में राजनीतिक खेल खेलना शुरू कर दिया । इसका परिणाम यह हुआ की आरक्षण का वर्गीकरण होने लगा और आरक्षण शिक्षा व नौकरियों में प्राथमिकता का कार्य करने लगा । अब यहीं से सारा समाज दोबारा अव्यवस्थित प्रणाली का शिकार हो गया । क्योंकि सरकारों ने 100 में से 60 फीसदी नम्बरों वाले को शिक्षक व डॉक्टर बना दिया और 100 में से 80 फीसदी नम्बरों वाले को अयोग्य घोषित कर दिया । इसका परिणाम क्या हुआ ? परिणाम यह हुआ कि दिमाग से अधिक कुशल व्यक्ति ने दिमागी खेल शुरू कर दिया और उसने निजी संस्थाओं को जन्म देना शुरू किया । स्कूल, हस्पताल और अन्य वह सेवाएं जो सरकार चला रही थी । चव्वनी को एक रुपया कैसे बनाना है जब लोग यह समझने लगे तो सरकार के अपने संस्थान डूबने लगे क्योंकि वहां अधिकता 60/100 होने लगी और ईधर 80/100 वाला निजी क्षेत्र में 100/100 होने का गुण सिख गया । आज स्थिति यह आ गयी है कि सरकारी संस्थान विलुप्त होने की कगार पर खड़े हैं तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय को कहना पड़ रहा है कि आरक्षण पर पुनर विचार करो और उच्च शिक्षा में आरक्षण पर अंकुश लगाओ ।
★अब सवाल यह है कि क्या आरक्षण नीति में बदलाव नही किया जा सकता क्या ?
बिल्कुल किया जा सकता है । सोचिये नेताओं ने वोट के चक्कर में बढ़ाया कहां से अगर संविधान संशोधन नही हो सकता था । संविधान में एक अनुच्छेद रखा गया है जिस पर संसद में चर्चा के उपरांत निर्णय लिया जा सकता है । लेकिन समाज राजनीति की भेंट चढ़ चुका है और लोग निजी हित में अंधे होते जा रहे हैं ।
" बौद्धिक परीक्षण में आरक्षण जैसी दीमक का उपयोग देश रूपी हरे वृक्ष को अंदर से खोखला कर देगी, इस बात को आरक्षण पर नही छोड़ा जा सकता कि 80 फीसदी नम्बर वाला शिक्षक/डॉक्टर नही हो सकता और 60 फीसदी वाला हो सकता है । तर्क बुद्धि संगत होने चाहिए न की समाज संगत । आरक्षण आया क्योंकि तर्क बुद्धि संगत न होकर समाज संगत थे । इन विषयों पर पुनर विचार की आवश्यकता ठीक उसी प्रकार है जैसे हरिजन समाज को बचाने के लिए आरक्षण की । अन्यथा शिक्षा, स्वास्थ्य व देश की विकास संरचना में भागीदार सरकारी संस्थान पैसे वाले लोगों के लिए पुनः दलित की भूमिका में खड़े नजर आने लगे हैं ।"