जब सड़क, बिजली,डॉक्टर व शिक्षक नही थे तब कैसा था पहाड़ पर जीवन



आज भले वह जीवन बहुत लाचार प्रतीत होता हो क्योंकि आप आज सुविधाओं के आधी हो चुके हैं । यही वजह है कि आज मानव सतर्क नही है । आप जिसे अपनी चतुरता समझ बैठें हैं वह आपके द्वारा अपने लिए ही रचा हुआ एक धोखा है । मनुष्य वक्त के साथ पढ़ लिख तो गया किन्तु वह प्राकृतिक तथा कृत्रिम में फर्क नही कर पाया । वह यह नही समझ पाया की परिवर्तन प्रकृति का नियम तो है पर जब वह प्राकृतिक रुख ही बदल देता है तो  अप्राकृतिक चीजों क्या अंजाम होगा ? अप्राकृतिक का मतलब मनुष्य द्वारा बनाई गयी । हाँ यह सच है कि प्रकृति में तो बदलाव होगा और हुआ भी है बहुत बार , फिर भी अगर इंसान मकड़ी की तरह जाल बुन रहा है तो आखिर किसके लिए ? जब बिजली नही थी पहाड़ो पर तब भी स्थिति इतनी दैनीय नही थी जो आज  10 से अधिक डैम परियोजनाओं के बाद है । आपने बिजली तो ला दी किन्तु आपने पुरानी टेहरी जैसे जगह को खत्म करके मुझे लगता है बहुत बड़ी कामयाबी हासिल नही की है । आपने नदियों का बहाव स्तर इतना गिरा दिया कि नदी (अलकनंदा) का पानी श्रीनगर में पीने लायक नही बचा क्योंकि स्थिरता की वजह से उसमे इतने कीटाणु उत्पन्न हो गए की उसको जनवरों के लिए भी हानिकारक बता दिया गया है । हालांकि विकास के लिए इन सब को नकारा भी नही जा सकता लेकिन विकास के नाम पर विनाश का जाल भी नही बुना जाना चाहिए । क्या उत्तराखंड को 26 -30 डैमो की  आवश्यक है ? जी नही ! डैमों की जरूरत सिर्फ नेताओं के लिए कमाई का जरिया है । अगर नही तो स्थानीय लोगों का रोजगार वहां क्यों नही है । क्या उत्तराखंड में इंजीनियर नही है ? या ITI,डिप्लोमा,डिग्री धारकों की कमी है ? लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है क्यों । नेताजी एंट्रेन्स का बहाना लगा के आपको अयोग्य घोषित कर देंगे क्योंकि उनको पता है हमने इनको जिन सरकारी संस्थानों/ गैर सरकारी संस्थानों से पढ़ाया है वहाँ हमने अध्यापक रखे ही नही थे । क्यों है न मझेदार खेल ?


" जो देश विकसित हैं उनका पहला काम क्या है कि अपने नागरिकों को अच्छे से शिक्षित करो, क्योंकि जिस देश के नागरिक तकनीकी रूप से पढ़े लिखे हैं उनको किसी मिसाइल या परमाणु बम को पहले से अपने पास रखने की जरूरत क्या है, वह इतने सशक्त हैं कि जरूरत पड़ने पर कभी भी और कितने भी बना सकते हैं "


दूसरी तरफ अपने देश की शिक्षा प्रणाली ऐसी है कि देश के IIT संस्थानों के प्राध्यापकों से देश के पुल ही नही बनते, हमे आज भी दूसरे देशों से डिज़ाइन करवाने पड़ते हैं । चौरास पुल , डोबरा चांठी पुल आदि कई उदाहरण उत्तराखंड में ही मौजूद हैं । तो क्या शिक्षा और शिक्षकों की समीक्षा नही होनी चाहिए ? इसके विपरीत पहाड़ पर हमारे पुर्वजो द्वारा कई ऐसे निर्माण किए गए थे जो आज भी खड़े हैं । तो क्या वह लोग शिक्षित नही थे ? और अगर नही थे तो उनको कहाँ से पता चला की मिट्टी,दाल, चूने आदि से भी चिनाई हो सकती है ? 


जी नही ! वह शिक्षित थे । वह लोग अपने पूर्वजों से अनुभव की शिक्षा लेते थे जिसको आज कल तकनीकी ज्ञान कह कर बन्द कमरों में बाँटा जा रहा है और आपको समझ में  न आये इसलिए उसको अन्य नामों से संबोधित किया जा रहा है । आखिर हिंदी राष्ट्रीय भाषा होकर भी लाचार क्यों हैं ? कौन करेगा इस पर समीक्षा और कब करेगा ? जवाब है कोई नही और कभी नही , क्योंकि आम जनता को यह पता नही चलना चाहिए कि वह जिस दवा को खा रही है उसमे क्या है एवं जो खाद्य पदार्थ दूसरे देशों से सरकार की मिली भगत से आपके रसोई में परोसे जा रहे है उनमे क्या है यह आम नागरिक को कभी पता नही चलना चाहिए । अगर ऐसा हुआ तो नेताओं की जवाब देही बढ जायेगी जो की उनको बिल्कुल पसन्द नही है । इसी लिए हिंदी भाषी देश के उच्च न्यायालय की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है । मैं हिंदी- हिंदी क्यों कर रहा हूँ इस बात को समझ रहें हैं न आप ? क्योंकि सरकार की शिक्षा प्रणाली हिंदी है भाई । तो पहाड़ी को शिक्षा में लाचार किसने किया सरकार ने ,वरना आज भी पहाड़ी बच्चा बौद्धिक परीक्षण में शहरी को पछाड़ दे अगर कार्य प्रयोगात्मक हो और हिंदी भाषा से प्रेरित हो । कहने का अर्थ है कि वह उस वक्त भी शिक्षक अभाव में अग्रणीय था और आज भी अगर प्रणाली की लाचारी न हो । हाँ डॉक्टरों के अभाव से पहाड़ो ने उस वक्त भी बुरे दिन देखे और आज भी देख रहा है । लोग बिना इलाज के मरे है इसको नकारा नही जा सकता किन्तु परम्परागत चिकित्सा पद्धति से कई लोगों को बचा भी लिया जाता था यह भी सच है । डॉक्टर जैसी सुविधा अगर उस वक्त होती तो लोगों में और अधिक जागरूकता होती जिससे फैलने वाले रोगों की रोकथाम की जा सकती थी और हजारों लाखों लोग जो बिना इलाज के दुनियां से चले गए शायद आज जिंदा होते । लेकिन जो परम्परागत चिकित्सा है "आयुर्वेद" उसका ज्ञान लोग उस वक्त आज से भी बेहतर रखते थे पहाड़ो पर, इसमे मुझे कोई सन्देह नही है । 1980 के बाद से और 2005 तक का दौर पहाड़ का सबसे अच्छा दौर रहा है मेरी नजर में क्योंकि लोगों का ध्यान साफ सफाई की तरफ जाने लगा तो बीमारियाँ अपने आप कम होने लगी , दूसरा कार्य शैली कठिन परिश्रम वाली थी तो पहाड़ियों को उच्च/निम्न रक्तचाप , हृदय रोग, शरीर के दर्द कम थे । सबसे मुख्य थी भोजन शैली क्योंकि शुद्ध दूध,घी, तेल खाते थे हालांकि इन चीजों का उत्पादन भी इतना नही था कि पूरे साल चल पाता किन्तु जितना था शतप्रतिशत शुद्ध था । आज की तरह नही की खपत पूरी करने के लिए कम्पनियाँ मिलावट करके अपना माल बेच देती हैं । सड़क का अभाव था तो लोग मिलों पैदल ही चलते थे , मुझे याद है कि जब मैं स्कूल में पढ़ता था तो तीन किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचता था और वहां पहुंचकर भी गुरुजन लोग व्ययाम(कसरत) करवाते थे । गुरुजन लोग जो पहाड़ी क्षेत्र से होते थे वह 15 मिनट में एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर पहुँच जाते थे । आज सड़क के आने से लोगों का पैदल चलना एक शहरी के बराबर हो गया है , फसलें कोई उगाता नही क्योंकि सरकार ने फ्री में राशन व मनरेगा जैसी व्यवस्थओं से लोगों को कर्महीन रहना सीखा दिया है । आज पहाड़ के लोग भी हृदय रोग और मांसपेशियों में कमजोरी जैसी समस्याओं का शिकार बन रहें हैं । तो कौनसा पहाड़ अच्छा था आप समीक्षा कीजिए ?

कुल मिला के अगर मैं उस वक्त की और आज की तुलना करूँ तो सिर्फ एक वाक्य लिखना चाहूंगा कि " सुविधाओं ने सम्वेदनाओं का अंत कर दिया है। "


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