जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ ।
मैं बपुरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ ।।
यही परिभाषा लागू होती है उस शहरी की सोच पर जिसको लगता है कि पहाड़ और पहाड़ी लोग अव्यवस्थाओं में जीवन यापन करके मौत को दवात दिये हुए हैं। मेरा मानना है की मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति ही यह सोच रखता है कि उसका घर हस्पताल के समीप या कम दूरी पर होना चाहिए और सड़क उसके दरवाजे पर होनी चाहिए । हो सकता है मैं गलत हूँ लेकिन आप खुद सोचिए कि पहले से अपने अस्वस्थता की कामना कौन करता है जो मानसिक रूप से स्वस्थ नही है या जिसको भय है कि मेरे साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है । मानव शरीर इतना कमजोर नही है जितना लोग समझ बैठे हैं। अगर आपका आहार सही है और कार्यशैली में कोई तनाव नही है और आप किसी अनुवांशिक बीमारी से ग्रसित नही हैं तो आपको डरने की कोई आवश्यकता नही है । विज्ञान भी यह बात मानता है कि सर्वाधिक रोग मानव शरीर मे अशुद्ध भोजन के माध्यम से प्रवेश करते हैं और उसके बाद तनाव भरे जीवन से और दोनों कारणों पर नजर डालें तो ऐसा होना शहरों में आम है । लेकिन पहाड़ी क्षेत्र के लोग इन सबसे कहीं न कहीं बचे हुए हैं और अगर कभी कभी उन्होंने रसायनिक मिलावट वाला भोजन ग्रहण कर भी लिया तो कठोर कार्यशैली की वजह से वह लोग उसको पसीने के रूप में शरीर से बाहर निकालने में सक्षम होते हैं हालांकि जबसे पहाड़ो पर सड़कों का जाल बना कहीं न कहीं उन लोगों की कार्य शैली में उसका प्रभाव देखने को मिलता है । पहाड़ों पर पानी और हवा तो शुद्ध है ही साथ ही साथ शहरों जितना रेडिएशन व चुम्बकीय क्षेत्र नही है जिस कारण पहाड़ी क्षेत्र के लोगों में शहरी नागरिक के मुकाबले अधिक ऊर्जा /स्फूर्ति देखने को मिलता है ।
शहरी नागरिक सभी प्रकार के प्रदूषण की मार झेल रहा है । जिसमे ध्वनि, वायु, भोजन व जल प्रदूषण तो चरम पर हैं तो ऐसे जीवन शैली जीने वाले को तो हस्पताल कुछ दूरी की बजाय घर मे ही होना चाहिए क्योंकि क्या पता कब विनटीलेटर की आवश्यकता आन पड़ जाये । देश के नागरिक विकास की दौड़ में सभी मानकों को इतनी पीछे छोड़ आए हैं कि आज से भी अगर दोबारा उनको ठीक करने बैठे तो अगले 50 वर्ष कम से कम लगेंगे । इन सबसे अभी कुछ पहाड़ी क्षेत्र बचे हुए हैं लेकिन सरकारों का ध्यान उनको भी बरबाद करने की तरफ है । भारतीय नागरिक को बस इससे ज्यादा नही समझ आता कि उसका काम किसी भी तरह कुछ सालों में करोड़ों के पार हो जाये बदले में चाहे जल जहर हो जाये या वायु लेने योग्य न रहे । एक सवाल जिस पर आज समाज की नजर नही है कि हम विकास का क्या करेंगे जब इंसान ही नही रहेगा या होते ही बीमारियों से ग्रसित होगा ? आज आप जितना सुख सुविधाओं से घिरते जा रहे हो उतनी बीमारियां आपके करीब आ रही है । आपका पानी प्रदूषित हुआ तो लोगों ने पानी के शुद्धिकरण के लिए मशीने लगा दी । अब उन मशीनों ने क्या किया कि पानी मे शरीर की जरूरत वाला एक भी मिनरल नही छोड़ा तो अब डॉक्टर कह रहे हैं कि लगातार ऐसे पानी का सेवन करने से भी लोगों को कई रोग हो रहे हैं । इसी तरफ फ्रीज ने हर घर मे मधुमेह का एक या दो रोगी पैदा किया तथा ओवन जैसी घातक किरणों से गर्म होने वाला खाना लोगों को कैंसर की तरफ धकेल रहा है । लेकिन क्या करें उस पढ़े लिखे गंवार शहरी पर इन सब बातों को सोचने का वक्त ही कहाँ है ।
ग्रामीण क्षेत्रों के प्रारंभिक चिकित्सा देने वाले हस्पताल क्यों ठप पड़ें हैं इसकी मुख्य वजह है कि पहाड़ी क्षेत्र के लोग सिरदर्द, बदन दर्द, जुखाम व बुखार से बहुत कम ही पीड़ित हैं और अगर कभी हो भी गए तो एक से तीन दिन में शरीर स्वतः ही खुद बा खुद ठीक कर लेता है । शहरी भारतीय आज अपनी पुरानी चिकित्सा पद्धति (आयुर्वेद) को भूल गए और गोलियां खा-खा के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को इतना बिगाड़ दिया है कि उनको बिना गोली के आराम मिलता ही नही जबकि इसके विपरीत पहाड़ी व्यक्ति आज भी स्वतः इन छोटे रोगों से उभर जाता है । उत्तराखंड पहाड़ी क्षेत्र के लोग आज भी सुखी व सुरक्षित हैं लेकिन अब धीरे धीरे डर लगने लगा है क्योंकि सत्ता धारी विकास के नाम पर वहां भी विनाश का जाल फैलाने लगें हैं और भोली जनता को लग रहा है कि अब हम भी शहरी बन जाएंगे । लोग यह भी नही सोच रहे हैं कि एक सड़क के जाने में कितने प्राकृतिक जल स्रोतों को नुकसान हो रहा, कितनी मिट्टी व वाहनों से निकला धुँआ हवा में उड़के उनके फेफड़ों में जा रहा है, कितना ध्वनि प्रदूषण बढ़ गया है । लोग वह लेख नही पढ़ पा रहे हैं कि वर्ष 2019 में उत्तर प्रदेश की नदियों के जल को इस स्तर तक ले जाने के लिए कि उससे हाथ पाँव भी नही धोया जा सकता के लिए 10 करोड़ का जुर्माना व नगर निगम व पालिका पर 1-1 करोड़ का जुर्माना लगया गया है । क्या इसी दिन के इंतजार को विकास नाम दिया जाना था ? और क्या करोगे ऐसे विकास का ? ऐसे लोगों को मैं यही तर्क दूंगा की अगर जगह साफ हो तो खुले में शौच जाने से बीमारी नही होती लेकिन साफ पडी नदी व मैदानों के प्रति गन्दी सोच दिमाग मे रखने से बीमारियाँ होती है । पहाड़ी नागरिक कई पीढ़ियों से खुले जंगलों में शौच जाता रहा उसको तो कोई बीमारी नही हुई लेकिन शहरों के सार्वजनिक शौचालयों को देखकर तो लगता है कि आदमी शौच करते करते ही मर जाए । पर समस्या क्या है कि अगर कोई सही समीक्षा करने बैठे तो सत्ता उसको जीने नही देती क्योंकि निजी स्वार्थ में चल रहा धंधा चौपट हो जाएगा । यही सब कारण है कि पहाड़ी नागरिक शहरी से सुखद है और सुविधाओं का वर्गीकरण सही ढंक से हुआ और पहाड़ी नागरिक सजक रहा तो पहाड़ी नागरिक सर्वाधिक स्वस्थ रहेगा आने वाले समय मे भी ।