परेडू और रौडी तकनीक


परेडू और रौडी तकनीक उत्तराखंड की दूध को मथने की पाराम्परिक तकनीक है । इस प्रकिया से मथे जाने वाले दूध से स्वादिष्ट मठ्ठा किसी और तकनीक से प्राप्त नही किया जा सकता है । यह दोनों ही परेडू और रौडी लकड़ी से निर्मित होते हैं । और यह लकड़ी पर अद्भुत कला का भी बेमिसाल उदाहरण है । परेडू लगभग 2.5 से 3 फीट ऊंचाई का नीचे से 1.5 फीट व्यास और ऊपर से 8 इंच से 10 इंच व्यास का शंकू आकृति का होता है । इसको अंदर से इस प्रकार काटा जाता है कि इसमें एक बार में कम से कम 5 से 8 लीटर दूध को रखकर मथा जा सकता है । उस जमाने में जब छेद करने के लिए विधुत उपकरण नही थे, अपने आप में बहुत बड़ी तकनीक थी । जिन लोगों ने परेडा देखा होगा उनको भली प्रकार याद होगा कि वह वास्तव में एक अनूठी ही कलाकारी है । क्योंकि उसको अलग अलग कर काटकर भी नही जोड़ा जाता था । दूध को मथने के लिए प्रयुक्त होने वाली रौडी भी लकड़ी से ही निर्मित होती है । यह लगभग 3 से 4 इंच व्यास का एक 5 से 6 फीट का डण्डा होता है,जिसके निचले सिरे को लगभग 1 फ़ीट तक चार भागों में बाँट दिया जाता है । इन चारों भागों को एक दूसरे से समान दूरी पर एक छल्ले की मदद से स्थिर (फिक्स) कर दिया जाता है । इस हिस्से को लगभग 5 से 6 इंच व्यास का बनाया जाता है जिससे वह परेडे में आसानी से घूस जाये ।यही हिस्सा दूध को मथने के कार्य में लाया जाता है ।


परेडे को उस स्थान पर रखा जाता है जहाँ पर रौडी को रस्सी की मदद से घुमाने के लिए दीवार पर हुक्क पहले से लगाए हुए होते हैं । उन्ही हुक्कों पर रौडी को फँसाया जाता है और रौडी के मध्य भाग में इसपर रस्सी को लपेट कर उसके दोनों सिरों को अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया जाता है । रौडी का अगला भाग परेडू के अंदर कम से कम 1.5 फीट से 2 फीट अंदर दूध में डूबा हुआ होता है जिससे जब एक हाथ से पकड़े कोने को खींचते है तो रौडी पूर्वावर्ती दिशा तथा दूसरे हिस्से को खींचने पर उत्तरावर्ती दिशा में घूमने लगती है और अंदर रखा दूध आसानी से मथने लगता है । इस प्रक्रिया में समय दूध की मात्रा पर निर्भर करता है और इस प्रकिया में समय 15 मिनट से लेकर 45 मिनट तक लग जाता है ।

वर्तमान समय में लोग यही काम मिक्सर ग्राइंडर या अन्य उपकरणों की मदद से करने लगे हैं जिस कारण अधिकांश घरों से परेडू और रौडी तकनीक भी गायब हो चुकी है । लेकिन मठ्ठे का वह स्वाद इन बिजली के उपकरणों से कभी प्राप्त नही होगा क्योंकि वह लकड़ी में मथा जाता है जिस वजह से उसकी गुणवत्ता अधिक होती है । यह तकनीक अब पहाड़ों में बहुत कम ही घरों में प्रयोग में लाई जा रही है ।


परेडू और रौडी तकनीक के फायदे :- इस तकनीकी के इस्तेमाल से कांधों व छाती की पसलियों की जबरदस्त कसरत हो जाती है । जिससे शरीर के ऊपरी भाग में जकड़न जैसी समस्या कभी हो ही नही सकती । आज शहरों में लोग जकड़न जैसी समस्याओं से ग्रसित हैं और फिजियोथेरेपी में जाकर हजारों रुपये भर रहे हैं । हमारे पूर्वज जो ज्ञान छोड़ गये उसका उपयोग समझ नही आया तो हमने उस वस्तु का परित्याग ही कर दिया,जबकि शहरी लोगों के पास वह तकनीक थी नही लेकिन उन्होंने वहीं से चोरी करके उसी के हल्के उपकरण बना के आपकी जेब से पैसे निकाल लिए ।




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