पहले जीवन बहुत सीमित था । उस वक्त में लोगों के पास इतना रुपया नही होता था । पैसों में ही लोग अपने परिवार का भरण पोषण करते थे और पैसों में ही बाजर भी चलते थे । जिसके पास मुद्रा के रूप में रुपया होता था वह अमीर गिना जाता था और लोग उसी से पैसों में कर्जा लेते थे ।

गरीबी का यह आलम था कि लोगों के पास कुछ पीतल और ताँबे के बर्तनों को छोड़कर अन्य धातुओं के बर्तनों का अभाव था । अनाज को रखने के लिए या तो लकड़ी के बक्से होते या फिर रिंगाली नामक लकड़ी से बनी कोन्नीयां होती थी । कोन्नी एक सिलेण्डर नुमा आकृति का ड्रम होता था । इसका आकार अलग होता था, पहाड़ों पर बड़े रूप में यह चार फीट ऊंचा और नीचे से डेढ़ फीट तथा ऊपर से ढाई फीट व्यास का वृत्ताकार ड्रम होता था । इसका छोटा रूप जो आप नीचे फोटो में देख रहे हैं, लगभग डेढ़ फीट ऊंचा और नीचे से छः इंच व ऊपर से दस इंच व्यास का वृत्ताकार ड्रम होता था । इनको रिंगाली नामक लकड़ी के बारीक बारीक पट्टियों को आपस में बुनकर बनाया जाता था तथा इसमें छेद बाकी न रहे इसके लिए इसको गाय/भैंस के गोबर से गौ-मूत्र की सहायता से लिपा जाता था । जसके बाद इनमें अनाज भंडारण आसानी से किया जाता था । यह ठीक उसी प्रकार उपयोग में लाया जाता था जैसे शहरों में लोग आटा चावल रखने के लिए प्लास्टिक या स्टील के ड्रम का उपयोग करते हैं ।
सुफ्फू/सुफ्फी अनाज को साफ करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है । पहाड़ के कुछ घरों में आज भी उपयोग में लाया जाता है । लेकिन अधिकांशतः इसके स्थान पर अब टीन से निर्मित सुफ्फू या सुफ्फी का प्रयोग होने लगा है । अतैव इसका अस्तित्व भी अब खतरे में ही है । यह भी रिंगाली नामक लकड़ी से ठीक उसी प्रकार बुनकर तैयार किया जाता रहा है जैसे कोन्नी । लेकिन अब इसने विक्रेता बहुत कम ही दिखने को मिलते हैं । एक तो अब उत्तराखंड के गांवों की खेती बंजर हो गयी क्योंकि गांवो में लोग रहे ही नही तो खरीदेगा कौन ? शहरी नागरिक को इनकी जरूरत है नही, तो ऐसे में इनका लुप्त होना भी स्वभाविक है ।
कोन्नी और सुफ्फू के विलुप्त होने का नुकसान:- रिंगाली नामक लकड़ी पहाड़ी क्षेत्र में अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर पाई जाती है । इसकी खासियत यह है कि इसकी लकड़ी बहुत लचीली होती है । ऊंचाई पर रहने वाले कई लोगों के लिए यह लकड़ी ही रोजगार का साधन थी । आज जब लोग पहाड़ो से पलायन कर गये और खेती बंजर हो गयी तो उनके रोजगार पर इसका बहुत बुरा असर पड़ा । अब जब खरीदने वाला ही नही रहा तो उत्पादक बनायेगा किसके लिए । ऐसे में अब सबसे बड़ा खतरा यह है कि लकड़ी को बुनने की यह कला भी इसी के साथ खत्म न हो जाये ।