6 मई 1937 को पहली बार श्रीनगर गढ़वाल में कांग्रेस पार्टी अधिवेशन में स्थानीय नेताओं व उनके समर्थकों ने अलग राज्य की मांग उठाई थी । फिर वक्त के साथ साथ कई संगठन उभरकर अलग राज्य की मांग में आये । इनमें सबसे पहला नाम है 1938 में श्रीदेव सुमन का संगठन गढ़देश सेवा जो बाद में हिमालय सेवा संघ के नाम से जाना गया । 1939 में गढ़देश जागृति संस्था, 1950 में पर्वतीय विकास जनसंस्था, 1967 में पर्वतीय राज्य परिषद, फिर 1970 में कुमाऊँ राष्ट्रीय मोर्चा आया जिसके महासचिव पी.सी. जोशी हुए , 1972 में उत्तरांचल परिषद आया ,1979 में उत्तराखंड क्रांति दल आया देवी दत्त पंत ( कुमाऊँ विवि केकुलपति ) थे, 1988 में उत्तराखंड उत्थान परिषद आया जिसके मुखिया सोबन सिंह थे और इसके बाद भी कई दल आये जिनका आज शायद ही कोई अस्तित्व बाकी हो । बद्रीदत्त पाण्डे और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा 1940 में ही हल्द्वानी अधिवेशन में अलग राज्य की मांग कर दी थी । लेकिन गोविंद बल्लभ पंत जानते थे कि अगर उत्तराखंड अलग राज्य बना तो यह बरबाद हो जाएगा । उन्होंने एक नही अनेक बार कहा था कि उत्तराखंड में संसाधनों व रोजगार का अभाव है अतैव यह अलग राज्य बनने की स्थिति में नही है । ऐसा उन्होंने 1952 में भी दोहराया जब पर्णिकर आयोग ने उत्तराखंड राज्य की मांग का समर्थन किया , लेकिन राजनैतिक भला सोचने वाले या तो वहाँ तक सोच नही सके या जानकर चुपचाप रहे । नतीजा आज सबके सामने है पर प्रश्न वहीं का वहीं आज भी खड़ा है । अलग राज्य के बाद नेताओं में विदेशों में तक जमीनें खरीद दी किन्तु उत्तराखंड में वह इंडस्ट्रीज नही बन सकी जिससे युवाओं को रोजगार मिल सके । क्या आपने सोचा कि राजधानी गैरसैंण (गढ़वाल) या कुमाऊँ में क्यों नही जा सकती ? जबकि जम्मू कश्मीर राज्य दो राजधनियाँ रख सकता है । पहाड़ का नेता ही पहाड़ में राजधानी नही चाहता लेकिन देहरादून में एक बन्द ऐसी कमरे में पहाड़ से पलायन कैसे रूकेगा इस पर चर्चा करता है, क्या आपको हंसी नही आयी ? तो फिर हंसिए न किसने रोका है ।
आज के हालात पर सिर्फ हँसा ही जा सकता है क्योंकि सम्वेदनाओं का अंत हो चुका है । लोग पशु प्रवृति वाला जीवन यापन करके खुश व सुखद जीवन का आनन्द ले रहे है । अपना पेट भरना चाहिए बस इतनी ही सीमा रह गई है आपकी और मेरी । नेता उस बाड़े का मालिक बन बैठा है जिसमें आप और मैं हैं और नेता की मर्जी है वह किसको घास डाले और किसको नही । यही तो चल रहा है क्यों ? आज शायद लोग खटीमा,मसूरी,रामपुर तिराह और श्रीयंत्र टापू भी भूल गये होंगे । आज कहाँ गये वह लोग जो अलग राज्य की मांग पर उतारू थे ? यह ही तो समीक्षा का विषय है । अगर ध्यान से देखोगे तो वही लोग नेता हैं या उन्ही के वंशज उत्तराखंड के नेता है । गोविंद बल्लभ पंत को ठीक उसी तरह से आइकॉन भर बना के रख दिया गया जैसे OMG में कांजी को अंत में मक्करों ने सच पर पर्दा डालने के लिए मूर्ति में बदल दिया ।भारत में अच्छे इतिहासकार शायद बहुत कम ही हुए लेकिन कहानीकार 95% से भी अधिक हुए । यही वजह है कि चन्द अच्छे लोगों को सिर्फ आगे खड़ा किया गया और सिपाही जो थे वह गढरत्न हो गये ।