क्या अव्यवस्थाओं का शिकार हो रहे हैं सरकारी संस्थान ?



जी हाँ ! यह विषय अत्यंत सोचनीय बन गया है , खासकर उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र के लिए । आप शिक्षकों से लेकर डॉक्टरों तक और पटवारी से लेकर डी.एम- एस.डी.एम, वकाली-न्यायाधीश तक सब कुछ अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ चुका है । आप श्रीनगर गढ़वाल, टिहरी,पौड़ी व चमोली को तो छोड़िए सहाब यहां तो काबिल डॉक्टर ऋषिकेश एम्स (IIAMS) में भी काम नही करना चाहता है । लोगों की कितनी उम्मीदें टिकी होती हैं कि हमारे राज्य में एम्स जैसा सरकारी स्वास्थ्य संस्थान है लेकिन आप अगर उस एम्स में एक दिन बिताएंगे तो आप समझ जाएंगे कि उसको कैसे अव्यवस्थित तरीके से चलाया जा रहा है । बहुत सारे लोग जो इस लेख को पढ़ रहे होंगे शायद गये भी होंगे ऋषिकेश स्थित एम्स हस्पताल में ।  यही हाल गढ़वाल मंडल के पहाड़ क्षेत्र/ शहरी क्षेत्र के स्कूलों का भी है । बाथरूम है तो उनको कोई साफ करने वाला नही है, नल है तो उनमें पानी की व्यवस्था नही है और कहीं कहीं तो दोनों ही नही है । सरकारी स्कूलों में सही बिजली की आपूर्ति नही है और बहुत सारे स्कूलों में तो बिजली आपूर्ति का माध्यम ही नही है । अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि किस दिशा में बढ़ रहा है राज्य ? क्या शराब नीति से राज्य चल जाएगा या सभी सरकारी संस्थानों को निजी हाथों में देने से राज्य चल जाएगा । जी नही ! नेता अव्यवस्थाओं में धीरे धीरे ऐसे उलझते जा रहे हैं जैसे मकड़ी भोजन की चाह में जाल बुनती है और एक दिन असहाय होकर उसी में उलझ कर मर जाती है । और जनता उस पतंगे की तरह दीप( सरकारी संस्थान) की लौ पर खींची तो आ रही है किन्तु वहां उसकी मौत है या कष्ट, इससे वह अनजान है ।


विकास की धुन पर विनाश की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है । आज आप शिक्षक,डॉक्टर या अन्य किसी सरकारी सेवा में सम्मिलित अधिकारी पर सीधा दोषारोपण नही कर सकते, क्योंकि एक डॉक्टर दिन भर में एक मरीज के लिए नही बैठा रह सकता है और न ही 100 से 200 मरीज एक दिन में देख सकता है, इसी तरह एक अध्यापक को भी 8 से 10 बच्चों की कक्षा को पढ़ने में कोई आनंद नही मिलता और न ही एक दिन में अगल अगल 3-4 विषय । सरकारों ने अव्यवस्थाओं में इन लोगों को गेहूं में घुन की तरह पीस डाला है ऊपर से सुविधाओं का अभाव आखिर कब तक कोई सहन करेगा और एक पढ़ा लिखा व्यक्ति फिर भी कोई न कोई विकल्प अपनी आजीविका का ढूंढ ही लेता है ।  आज की जो शिक्षा प्रणाली है उससे आप आने वाले भारत के भविष्य को अधूरे ज्ञान की तरफ धकेल रहे हो । मानसिक रूप से असंतुष्ट अध्यापकों से पढ़ने वाले बच्चे ही आगे जाकर डॉक्टर, इंजीनियर व पदाधिकारी बनेंगे और उस अधूरे ज्ञान से यही लोग अपने ही देश के नागरिकों को मरेंगे, जिसकी शुरुआत लगभग हो चुकी है । मैंने पिछले लेखों में भी लिखा है कि कैसे iit प्रोफेसरों के दखल के बाद भी श्रीनगर का पुल गिर गया था , हस्पतालों में आये दिन सुनने को मिलता है कि साधारण समस्या में भी डॉक्टर ने मरीज को दुनियां से वापस भेज दिया । क्या सरकारें यह भी भूल गयी की एक डॉक्टर को कुशल डॉक्टर बनने हेतु कितने लोगों की जानों से खेलना पड़ता है और जब वह कुशल हो जाता है तो सरकारें उसको उचित व्यवस्थाएं मुहैया करवाने में नाकाम होती है और परिणामस्वरूप वह निजी हस्पताल को जन्म दे देता है ।

सरकारें जनता को ₹ 10/- और ₹ 50/- की पर्ची से क्या दिखाना चाहती है ? या आपने खुद ही मानक तय कर लिया है कि ₹10/- या ₹50/- में तो इतना ही मिलेगा बोस और ज्यादा चाहिए तो निजी हस्पतालों में जाओ उनको हमने यही से सीखा के भेजा है । अगर यही जवाब है तो मुझे लगता है राज्य/ देश गलत हाथों में था और है । कई बार मुझे बड़ा अफसोस होता है कि नेताओं ने शिक्षा नीति को कितना गिरा दिया । शिक्षा पर समीक्षा कर रहा हूँ क्योंकि मैं इस क्षेत्र में कार्य कर चुका हूँ और इसे अपना सौभाग्य समझू या दुर्भाग्य की मेरे देश के 80% मास्टर डिग्री धारकों को न तो सही से पत्राचार करना आता है और न ही वह कोई शोध पत्र लिख सकते हैं या सही से लिख सकतें हैं । देश में विश्वविद्यालय कागज बॉटने का एक माध्यम भर बनके रह गये हैं । लेकिन मैं हैरान भी हूँ और परेशान भी कैसे इस तरफ किसी का ध्यान नही गया और अगर यहां किसी का ध्यान नही गया तो शिक्षक का कद छोटा करने पर सरकारों का जोर क्यों है । सरकारें अपनी गलती क्यों नही स्वीकार करती कि वह खुद अपने कर्मचारियों से काम लेने में असमर्थ है । और अब आप उनको नकारा साबित करना चाहते हैं तो उनको हटाने के लिए अव्यवस्थाओं का जाल बुना जा रहा है ताकि लोगों में यह भ्रांति पैदा की जा सके कि सरकारी कर्मचारी काम नही करते या करना नही चाहते । राज्य दिशाहीन लोगों के हाथों में है ऐसा प्रतीत होता है क्योंकि किसी विषय या वस्तु का इस कदर बरबाद हो जाना, अपने आप में कई सवालों को जन्म देता है और वह सवाल भी एक दूसरे में उलझे हुए हैं जिसका मतलब साफ है कि सब कुछ अव्यवस्थित तरीके से बनाया गया खेल है ।  इन दो तस्वीरों को ध्यान से देखों ये अपने आप मे बहुत कुछ सवाल पूछ रही हैं । न शहर सुरक्षित दिखता है न पहाड़, लेकिन अरबों रुपये सरकारों के कागजों में लिखे हुए जो उन्होंने इन सब पर खर्च किये जिसका परिणाम आपके सामने है । सवाल कभी एक था जो आज हजार हो गये हैं लेकिन आज सब सवालों का जवाब एक है कि विकास कार्य हो रहे है । अब इनको अगर विकास कार्य कहते है तो सरकारें विनाश कार्य को कैसे परिभाषित करती है इस पर गहन चर्चा होनी चाहिए ।

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