उत्तराखंड के मूल निवासी हो तो सोचो ऐसा क्यों हुआ ।
पहाड़ की जातियों व निवासियों का कद आज देहरादून ऋषिकेश व हरिद्वार में बैठे कुछ लोग कैसे छोटा करने की कोशिश कर रहें हैं यह अपने आप में सोचनीय विषय है । जिन बनियाओं का उत्तराखंड के इतिहास में कहीं नामों निशान ही नही है वह अपने आप को देहरादून,ऋषिकेश व हरिद्वार का मालिक समझ बैठें है । बड़ी हैरानी होती है सहाब जब ऋषिकेश में बैठा एक बणिया मुझसे कहता है की भाई सहाब पहाड़ी तो कोई था ही नही सब शहरी ही थे, कोई कहीं से आया कोई कहीं से । अब इसमें गलती उसकी भी नही है, गलती है उन कहानीकारों की जिनका लिखा आधा अधूरा इतिहास उसने पढ़ा या उसको पढाया गया और उससे भी बड़ी गलती है पहाड़ी नागरिकों की जिन्होंने ऐसे लोगों को उत्तराखंड में मुख्य जगाहों पर अपनी जमीने बेची । उसको लगता हैं की उत्तराखंड सन 2000 से ही शुरू हुआ है या जब से अंग्रेज रेल ले के आये तो जो लोग रेल से उत्तराखंड आये इन्ही की तरह वह लोग उत्तराखंड के मूल निवासी हैं । सवाल आज यह हो गया है कि बणिया उसी जगह पर मालिक हो गया है जहाँ वह शरणार्थी बनके आया था । क्योंकि भारत - पाक बंटवारे में बहुत सी मैदानी जातियों को शरण के लिए जगह दी गयी थी और उनमे से अधिकांश यहीं बस गए । लेकिन इसका यह मतलब तो कहीं से नही हुआ न कि उत्तराखंड का इतिहास 1946-47 से ही शुरू हुआ । यही इतिहास यहाँ आए मुसलमानों का भी है और सिखों का भी, लेकिन समस्या यह हो गयी है कि पहाड़ियों ने शहर की प्रमुख जगाहें इनको बेच दी और यही शरणार्थी आज उन्हीं लोगों से खा भी रहें और गुररा भी रहें हैं । इसकी सबसे मुख्य वजह है पहाड़ से हुए नेताओं का नकारापन, अगर एक भी नेता ने आज तक पहाड़ियों के लिए कुछ किया होता या अपने निजी स्वार्थ के लिए इन बनियाओ की गोद में नही बैठा होता तो आज ऐसे सवाल खड़े नही होते कि जिन लोग का उत्तराखंड में 200 से 300 वर्षों का सतिहास भी नही है वह भी पहाड़ी नागरिक की नागरिकता पर सवाल खड़ा कर दे ।
अच्छा आप एक बात पर ध्यान दीजिए कि कैसे उत्तराखंड में ही यहां के मूल नागरिकों को लूटने का षड्यंत्र हो रहा है और उसमें यहीं का मूल नागरिक भी अपने निजी स्वार्थ के लिए शामिल है । ऋषिकेश में लक्ष्मण झूला के पास दो निजी पार्किंग बनायी गयी है और दोनों के मध्य में पुलिस चौकी स्थित है । यहीं का नागरिक जब वहां अपनी गाड़ी लगाने जाता है तो उससे 120 रुपये पार्किंग भाड़ा लिया जा रहा है और अगर आपने सड़क पर गाड़ी सड़क सीमा से अंदर भी दबा रखी है उस पर भी थाना प्रमुख चालान काट रहें हैं । अच्छा जब मैंने वहां स्थित एक पुलिस वाले से बात की, कि आपके सामने लूट हो रही है और आप चुपचाप खड़ें हैं ? तो उसका जवाब था सहाब हम तो सिपाही है आप चौकी में जाकर शिकायत कीजिए । अब आप सोचिये कि कितनी बड़ी अव्यवस्था का जाल बुना गया है । चौकी की मिली भगत के बिना जो कार्य सम्भव ही नही हो सकता उसको भी लोग ऐसे कर रहें हैं कि मानों कानून यही बनाते हों । चलो एक बार को यह माना जा सकता है जब यात्रा का समय हो तब महँगाई हो सकती है लेकिन नवम्बर में कौन-सी यात्रा का समय है और आपको सिर्फ आधा घण्टा गाड़ी खड़ी करनी है तो 120 रुपये किस बात के दिए जाय । सरकारी सेवाओं का पतन का मुख्य कारण भी यही लोग हैं और ऐसे ही नेता हैं जो निजी स्वार्थ के लिए जनता के अधिकारों का हनन करतें हैं और ऊपर से शासक/प्रशासक उनका साथ दे रहा होता है ।आज उत्तराखंड को पुनः आंदोलनों की जरूरत आन पड़ी है और अगर राज्य की जनता ऐसे ही चुपचाप जुल्म सहती रही तो यकीन मानिए वह वक्त दूर नही जब आपको अपने ही राज्य में सिर झुका के जीना पड़ेगा । जिन नेताओं को पहाड़ की जनता चुनती है उनकी जवाब देही पहले से जनता तय करके रखे और अगर वह किये वादों पर मुकर जाए तो क्षेत्रीय जन आंदोलन होने चाहिए । अपने निजी स्वार्थ को देखते हुए पहाड़ो पर बाहर के लोगों को अपनी जमीनें न बेचें और न गोरखाओं को वहां बसाए । हाँ अगर आपको किसी को रेख देख हेतु रखना है तो उसका आये साल या हर दो साल में कोर्ट से सत्यापन पत्र करवाए कि अमुक व्यक्ति और उसका परिवार एक साल या दो साल के लिए खेती की रेख देख हेतु रखा गया है ।
"शतर्क रहें और समझदार बनें, पूर्वजों द्वारा की गई गलती न दोहराए और न नेताओं पर ज्यादा भरोसा रखें"