आज पहाड़ पर स्कूलों व उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त भवन हैं । यातायात के लिए पर्याप्त सड़कें भी हैं । छोटे व बड़े हस्पताल भवन भी उपलब्ध हैं । तो आखिर पलायन क्यों नही रुक रहा ? इस सवाल ने करोड़ो नही, अरबों पैसा बरबाद करवा दिया है । जी हाँ ! सही पढ़ा आपने ने अरबों । विगत आठ - दस वर्षों में सरकारों ने पहाड़ पर खूब पैसा खर्च किया पर आज भी सवाल फिर वही है कि लोग पहाड़ से देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार या अन्य राज्यों की तरफ क्यों भाग रहे हैं । अब अगर मैं इसकी वजहों को लिखने लगूं तो बहुत सारी वजह है किन्तु सभी तालों की एक मास्टर चाबी ( मास्टर की) भी होती है तो इस लेख में मैं उसी मास्टर चाबी की बात करूँगा क्योंकि बाकी वजह तो हर आम आदमी भी जानता है । आज इस बात को नकारा नही जा सकता कि बीते एक दशक में सरकारों ने पहाड़ पर पैसा खर्च किया है । सवाल यह है कि चूक कहाँ हुई और पलायन क्यों नही रुका ? सरकार ने पैसा तो लगाया लेकिन वह उस पैसे से करवाये गये काम की निगरानी नही रख पाई और जहाँ कोशिश की भी वहां बिल्ली को दूध की निगरानी में रख दिया । तो अब आप सोचिए कि दूध बचेगा ? इसका जवाब है हाँ बचेगा अगर दूध गर्म गर्म है तो । लेकिन अगर ठंडा है तो कोई उम्मीद नही है की दूध बचेगा । बस यही हुआ पहाड़ पर जनहित में खर्च किये गये पैसों से बनाये हुए भवनों व सड़को के साथ । सड़कें तो हैं पर परिवहन व्यवस्था उचित नही है । स्कूल तो हैं पर आज बच्चे नही हैं तथा जब बच्चे थे तब अध्यापक नही थे । गाँव - गाँव में छोटे हस्पताल तो हैं पर डॉक्टर नही हैं । तो आज क्या चाहिए पहाड़ को ? क्या है वह मास्टर चाबी इन तालों की ? उत्तर आपके सामने है, एक ईमानदार व निष्ठावान व्यक्ति हर क्षेत्र में जो जवाब देही तय कर सके । पर अब अगर यह अतरिक्त काम करना पड़ गया तो आप सोच रहे होंगे 1993 में आयी पंचायत राज व्यवस्था का क्या फायदा हुआ ? तो आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं । अब आप इसी लेख पर ध्यान केंद्रीत कीजिए थोड़ा ऊपर इस लेख में लिखा गया था कि बिल्ली से दूध बचाया जा सकता है अगर दूध गर्म गर्म हो । तो गर्म गर्म दूध कब रहेगा जब उसमें बराबर आग की लौ जगी हो, है न । तो पंचायत राज व्यवस्था में वह लौ है जनता । पंचायत राज व्यवस्था का उद्देश्य ही यही था कि "प्रशासन में जनता की भागीदारी बढाना" लेकिन समस्या कहाँ आयी ? क्योंकि 90% जनता को अपने अधिकार पता ही नही हैं ।
बलवंत राय मेहता समिति और अशोक मेहता समिति आयी ही इसी लिए थी कि पंचायत राज व्यवस्था की जरूरत क्या है और क्यों है । और केंद्र सरकार की योजनाओं को गांवों तक कैसे पहुंचाया जाय तथा जनता उसमें अपनी भागीदारी निभा सके और पारदर्शिता बनी रह सके । पर अफसोस कि आज के युवा को इसका बोध ही नही ! उसको लगता है कि उसके बोलने से क्या होगा इससे अच्छा है जो चल रहा है उसी में हाथ धो डालो । जनता की इसी सोच ने 2005 में RTI की व्यवस्था को जन्म दे दिया क्योंकि 5 से 10% लोग ही सही के लिए आवाज उठाते थे और आरोपी बरी हो जाता था क्योंकि बाकी लोग उसी थाली में शामिल होते थे जिसमें ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत व अन्य लोग सम्मिलित होते थे । यही दशा देश में राजनेताओं की भी थी और अन्य संगठनों या निजी संस्थानों की भी । दशा यह है कि राज्यों पर अशिक्षित राज कर रहे हैं और जिनको अपने अधिकारों का ही नही पता वह लोग उनकी वाह वाही कर रहें है । परिणाम यह है कि देश है राज्यों का समूह और जब राज्यों में ही अनपढ़(कम समझ) शासक हैं तो केंद्र को भी वह मजबूती नही है जो होनी चाहिए थी जिसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर देखने को मिलता है । खैर हमारी समीक्षा सिर्फ गढ़वाल मडल के पहाड़ी क्षेत्र पर होती हैं अतैव देश को यहां हम सम्मिलित नही करना चाहते । लेकिन देश का कोई भी क्षेत्र बिना केंद्र के सहयोग के विकसित नही किया जा सकता यही मकसद था भारत में पंचायत राज व्यवस्था को लागू करने का । तो आज पहाड़ क्षेत्र को कुल मिला के दो चीजों की आवश्यकता है, पहला है ईमानदार व कर्मठ अफसर व दूसरा है जागरूक जनता जिसको अपने अधिकारों का बोध हो ।
"नेता से काम लेना सीखे, सेवक को सर्वोपरी न समझे क्योंकि आपके मत की वजह से और कर व्यवस्था से उसको वेतन मिलता है, जिस दिन जनता को इतना विवेक बन जाएगा पहाड़ सुख सुविधाओं से परिपूर्ण होगा । बाशर्त है निजी स्वार्थ का परित्याग करना होगा ।"