विधायक जी ने टिकट के दिए करोड़ों रुपये तो विकास क्षेत्र का होगा या रिश्तेदारों का ?


वर्ष 2019 का उत्तराखंड पंचायत चुनाव बड़ी करीब से देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो इस लेख पर समीक्षा कर पा रहा हूँ । पंचायत राज व्यवस्था जब आयी थी तो ग्राम पंचायत चुनाव में केंद्रीय पार्टियों की कोई भूमिका नही होती थी और न ही राज्य पार्टियों की, क्योंकि इसका आने का कारण ही यही था कि आम जनता की भागीदारी बढ़े तो किए गये कार्यों मे पारदर्शिता आयेगी । लेकिन आज सब कुछ विपरीत हो गया है, किसी कार्य के ग्रामसभा तक आने में 25 से 30% बजट तो विधायक,जिला अध्यक्ष व अन्य ब्लॉक सदस्य चट कर जाते हैं उसके बाद BDO/VDO व जेई सहाब भी 5-10% बजट पैसा पास करवाने के नाम का खाते हैं । अब आप ध्यान दें कि लगभग 40% बजट तो विकास कार्य शुरू होने से पहले ही गायब हो जाता है और बाकी 60% में क्षेत्र पंचायत/ प्रधान भी है और ईमानदारी का कार्य भी । अच्छा मझेदार बात यह है कि अब सरकारों ने बिना किसी रोक टोक के खाने के लिए पंचायतों में भी जिला पंचायत को पार्टियों से प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया है और कहीं कहीं तो सुनने में आता है कि ग्राम प्रधान भी पार्टी से प्रोत्साहित हैं । 

वर्ष 2019 के पंचायत चुनाव को बारीकी से देखा और उसका अध्ययन किया तो मैंने पाया कि विकास तो सिर्फ छलावा है क्योंकि जितना पैसा उम्मीदवार चुनाव पे खर्च कर रहा है, मैं समझता हूँ कि अगर उतना पैसा उस क्षेत्र से उम्मीदवारी करने वाले लोग इकट्ठा करदें तो शायद एक ग्रामसभा को स्वर्ग बनाने के लिए हमे न राज्य के नेता की जरूरत है न जिला और न ब्लॉक की । वर्ष 2019 के पंचायत चुनाव का मैंने जब आकंलन किया तो पाया की केंद्रीय पार्टी से प्रोत्साहित उम्मीदवार ने अकेले ही 8 से 10 लाख का खर्चा कम से कम किया है और लगभग 2 से 3 लाख निर्दलीय सदस्य ने भी किया होगा , कुल सदस्य दो थे तो मोटा मोटा इन्होंने भी 6 से 8 लाख खर्चा किया ही होगा । पंचायत की सबसे छोटी इकाई ग्राम प्रधान उम्मीदवारों ने भी 2-2 लाख तो कम से कम खर्चा किया ही होगा । हाल यह था कि चुनाव से एक दिन पहले स्थानीय ठेकों पर दारू खत्म हो गयी थी, अब आंकलन कीजिए कि पैसों की स्थिति क्या रही होगी । मोटा मोटी मान लो की 22 लाख खर्च हुए और किस्मत जगी तीन लोगों की । अब आपको लगता है कि पहले 2-3 साल में कुछ विकास कार्य होगा तो भूल जाइये, और अगर हो रहा है तो मान लीजिए उस व्यक्ति के अंदर कहीं न कहीं आत्मीयता बची हुई है । अब सोचने वाली बात यह है कि लोगों के पास इतना पैसा आता कहाँ से है ? इसके दो स्रोत हैं, अगर उम्मीदवार किसी पार्टी से प्रोत्साहित है तो उसमें कुछ प्रतिशत पैसा उसी पार्टी का लगा हुआ होता है । दूसरा अगर उम्मीदवार निर्दलीय है तो उस पर पैसे लगाने वाले उसके खास रिश्तेदार या सम्बंधित ही होते हैं जिनका भला वह जितने के बाद करता है । यही वजह है कि निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव पर उतना खर्चा नही कर पता जितना की किसी पार्टी से प्रोत्साहित उम्मीदवार लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार ईमानदार ही है यह नही कहा जा सकता है ।

ठीक यही होता है एक विधायक के साथ किन्तु विधायक को आज की राजनीति में टिकट पर ही इतना पैसा खर्च करना पड़ रहा है कि उतने पैसे से वह ब्लॉक की सभी ग्रामसभाओं को आधारभूत सुविधाओं से परिपूर्ण कर दे अगर कार्य ईमानदारी के साथ पूर्ण हो । वर्ष 2014 में एक विधायक बनने के लिए लगभग 2 से 3 करोड़ खर्च करना पड़ा और वर्ष 2019 में यही बढ़कर लगभग 10 से 15 करोड़ हो गया और यह पैसा कोई चुनाव आयोग नही ले रहा न ही किसी विकास कार्य के लिए जा रहा है । यह पैसा सीधा पार्टी फण्ड में जाता है और विधायक को इजाजत देता है कि अब आप योजनाओं को खाने के लिए स्वतंत्र हो, केंद्रीय सरकार कहती है कि अब आप देख लीजिए आपको कितना विकास करना है और कितना खाना है । लेकिन समस्या केवल इतनी ही नही है कि पैसा केवल केंद्र सरकार को गया और स्वीकृति मिल गयी । ऐसे व्यक्ति पर जिसने पैसा लगया होता है उसको भी उससे 2 से 3 गुना वापस चाहिए होता है । तो अब आप सोचिए, विकास कब होगा और अगर आपके विधायक जी जीत भी गये तो विकास किसका होगा ? हैरानी तो इस बात पर होती है कि इतना कुछ होने के बाद भी लोग नेता जी पर भरोसा बनाये हुए होते हैं और नेता जी भी वक्त वक्त पर निवाला फेंकते रहते हैं ताकी वही लोग मुसीबत में साथ भौंक सकें ।

भारत रूपी भवन को मजबूती ऊपर से दी जा रही है और बुनियाद को खोखला किया जा रहा है । एक MLA 70 से 75,000 /- माह की पेंसन ले रहा है वह भी अगर दो बार MLA हुआ तो 1,40,000 से 1,50,000 /- माह और नागरिक की पेंसन बन्द कर दी गयी जिसकी 20,000 से 30,000/- माह पेंसन थी ऊपर से इतने कर लगा दिए गये की उसको बेमानी करने के अलावा कोई रास्ता नजर आता ही नही है, आखिर वह करे भी क्या ! अगर जिंदा रहना है तो करना पड़ेगा । 


" पत्तों को कब तक पानी पिलाओगे सहाब एक दिन आएगा जब जडें जवाब देने लगेंगी और ये जो हरा भरा वृक्ष तुम्हें ऊपर ऊपर नजर आ रहा है एक दम से लड़खड़ा पड़ेगा, अभी अभी अर्थव्यवस्था ने एक संकेत दे दिया है अगर अभी भी समझ नही आया तो पतन ज्यादा दूर नही है"



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