फुलारी (फूलदेई) प्रथा

फूलदेई उत्तराखंड में बसन्त में मनाया जाने वाला एक त्यौहार है । इस त्यौहार में अधिकांशतः दस या दस वर्ष से कम आयु के बच्चे हिस्सा लेते हैं । कुछ स्थानों पर इस त्यौहार में केवल कन्याएं हिस्सा लेती है लेकिन अधिकांशतः इसमें बालक तथा कन्याएं दोनों ही हिस्सा लेते हैं । यह बसन्त के आगमन की खुशी को प्रकट करता है । चैत्र माह उत्तराखंड में कई रूपों से उल्लास का माह है । इसी माह में अधिकांश नव-विवाहित लड़कियां अपने मायके में एक माह के लिए ससुराल से लौट आती है और अपने पुराने दिनों की यादों को ताजा कर इस पर्व को खुशी से मनाती हैं । चैत्र माह तो पहाड़ो पर जैसे कई कलाकृतियां बिखेर देता है । ऐसा दृश्य कि, जी करता है बस देखतें ही रहें । पीले फ्योंली के पुष्प, धौले के लाल पुष्पों का मीठा पराग, स्याकने के नीले पुष्पों से लहलहाते खेत, सांदण, गुरियाल,बुराँस और अन्य नाना प्रकार के पुष्पों से धरती ऐसे आलौकिक लगती है मानो स्वर्ग से लाखों परी धरती पर उतर आयी हों । उस दृश्य की परिकल्पा केवल वही समझ सकता है जिसने बसन्त में फूलदेई को मनाया हो ।


फूलदेई का नियम भी बड़ा अनुशासित होता था । जिसमे कुछ दिन बासी फूल डालने की इजाजत नही होती थी । हर रोज सुबह सूरज आने से पहले फूलों को चुनकर लाना और फिर सूरज की पहली किरण निकलने से पहले हर घर की हर चौखट पर फूल लगाकर रखना, अपने आप में कुछ ही दिन में अनुशासित कर देता था । चैत्र माह का फूलदेई त्यौहार हर्सोल्लास का पर्व माना जाता है । चैत्र माह की संक्रांति को जब यह पूर्ण होता है तो उसके बाद पहाड़ो पर मेलों का आगमन हो जाता है । फूलदेई के समापन के दिन लोग अनेक प्रकार के पकवान पकाते हैं तथा ईश्वर को भोग लगाने के बाद जब फुलारे (फूल डालने वाले बच्चे) आतें हैं तो हर घर में उनका विशेष आतिथ्य किया जाता है । केवल यही एक दिन इस पूरे फूलदेई माह का ऐसा होता है जिस दिन बच्चे सूर्य उदय के बाद पुष्प लेकर जाते हैं । इस दिन बच्चों की थालियां पुष्पों के साथ साथ पीठाई व पकवानों से भी सुशोभित होती हैं । अपने मायके में आयी नव-विवाहिताएं अपने बचपन के दिनों को याद कर मन ही मन उल्लसित हो उठती हैं । क्योंकि यह सभी के जीवन का एक अनमोल क्षण होता है जो फिर ताउम्र लौटकर नही आता है ।

आज दुर्भाग्य से यह हर्षोल्लास की प्रथा भी दम तोड़ने लगी है । इसकी वजह भी बहुत कारुणिक हो गयी है । आज पहाड़ों पर नयी पीढ़ी के लोग रहे ही नही, सब शहरों में आ गये हैं और शहरों में यह बसन्त पर्व कोई नही मनाता है । क्योंकि बसंत होता क्या है यह सिर्फ एक पहाड़ी नागरिक ही समझ सकता है । ऐसा भी नही है कि शहरों में आये लोगों को अपने त्यौहारों की याद नही आती है लेकिन जीवन संघर्ष के आगे सब मजबूर हैं । आज पहाड़ों पर सिर्फ बुजुर्ग लोग रह गये हैं और वे भी किसी न किसी मजबूरी के कारण ही वहां पर रह रहे हैं, तो ऐसे में सूने पड़े इन घरों की चौखटों पर कौन पुष्प डालेगा। सरकारों में बैठे लोगों ने कभी इस तरफ ध्यान दिया नही, जो भी पहाड़ से नेता हुआ उसने देहरादून या अन्य शहरों में घर बना लिया तो पहाड़ का विकास कैसे होता । यही वह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है उत्तराखंड पहाड़ी क्षेत्र का कि उत्तराखंड बनने के बाद अपने ही लोगों ने पहाड़ और पहाड़ी नागरिकों की बर्बादी की कहानी लिख डाली । इस बर्बादी में सिर्फ इंसान बर्बाद नही हुआ, उनके साथ बर्बाद हुई कई पीढ़ियों की समाजिक विरासत, लोकगाथाएँ, पौराणिक धरोहर आदि ।

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