जब तक उत्तराखंड उत्तरप्रदेश अधीनस्थ था उस वक्त तक स्थानीय नेताओं का कहना था कि लखनऊ में बैठी सरकार पहाड़ों के विकास में विफल है । लेकिन 2001 में विशिष्ट राज्य का दर्जा प्राप्त करने के बाद भी पहाड़ो पर युवाओं के रोजगार के लिए कोई उद्योग नही जमा पाये, क्यों ? जबकि ऐसा भी नही है की यह कार्य हो ही नही सकता है । इसके लिए बहुत दूर जाने के जरूरत बिल्कुल भी नही है आप अपने समकक्ष राज्य हिमांचल पर नजर डालिए , आखिर वहाँ कैसे उद्योग स्थापित हो गये ? क्या पहाड़ की जनता इस विषय पर समीक्षा करेगी ? या मान लिया जाय की उत्तराखंड जनता व सरकरें दारू से ऊपर नही सोच सकती हैं ।
गढ़वाल के पहाड़ों को सिर्फ यह कहकर चुप करवा दिया जाता है कि भौगोलिक स्थिति ठीक न होने के कारण वहां तक कच्चा माल पहुंचना जोखिम भरा व खर्चीला है । लेकिन इसके विपरीत नेता जी लोग भारत तो छोड़ो दूसरे देशों में होटल चला रहें है वह भी उत्तराखंड में बैठकर, तो समझ यह नही आता की वह जगह देहरादून से कैसे सुगम हो गई । आपको आज विकास का एक पौराणिक और उत्तराखंड पहाड़ का ही उदाहरण देता हूँ कि आखिर विकास होता कैसे है और उसके लिए क्या सच में अरबों खरबों रुपये की जरूरत है ? जी नही !
सुदर्शन शाह जब अंग्रेजो का युद्ध का व्यय नही लौटा पाया तो अंग्रेजो ने बदले में श्रीनगर पर कब्जा किया और उसके बाद अंग्रेजो ने पौड़ी को अपना अड्डा बनाया । राजा सुदर्शन शाह अपना राज पाठ लेकर टिहरी चले गये और फिर उनके तीन पुत्र हुए । नरेंद्र शाह जिन्होंने नरेंद्रनगर को राजधानी बनाया , प्रताप शाह जिन्होंने प्रतापनगर को राजधानी बनाया और कृतिशाह जिन्होंने कृतिनगर को राजधानी बनाया । अब गौर कीजिये अंग्रेजो ने श्रीनगर पर ध्यान दिया तो श्रीनगर आज भी आवाद है, पौड़ी भी आवाद है । सुदर्शन शाह के बेटों ने तीन जगह राजधानी बनाई तीनों बसी हुई हैं । इससे आपने क्या आंकलन लगया ? जहां सत्ता जाती है वह क्षेत्र खुद बा खुद वृद्धि करने लगता है । दूसरा जहां सत्ता होती वहां लोग खुद नये उद्योगों को जन्म देते हैं फिर सत्ता की बड़ी भूमिका नही रह जाती है । देहरादून इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, आज से 15 साल पहले के देहरादून और आज के देहरादून पर नजर डालिए तो आप समझ जाएंगे की पहाड़ों का विकास कब होगा और कैसे होगा ।
गैरसैंण का मुद्दा अपने आप में क्रांतिकारी मुद्दा है पहाड़ व पहाड़ियों के लिए लेकिन सत्ता में बैठे लोग और वह व्यपारी वर्ग जिससे सत्ता के तार जुड़े हुए है, उनको यह मंजूर नही है । सरकार बिजनौर व सहारनपुर को उत्तराखंड में इसी मनसा से मिलना चाहते हैं कि गैरसैंण का मुद्दा खत्म हो जाएगा क्योंकि राजधानी का केंद्र में होना एक उदाहरण बन जाएगा । जब राज्य उत्तर प्रदेश था उस वक्त चमोली,रुद्रप्रयाग,उत्तरकाशी,टिहरी व पौड़ी गढ़वाल के लोग कैसे अपने काम करवाते थे । क्या इसकी समीक्षा नही करनी चाहिए नेता जी ? या आप लोग सुगम में रह सके इसलिए गढ़वाल क्षेत्र की जनता को मरणासन्न छोड़ दिया जाय । पहाड़ की भोली जनता को गुमराह करके जब जगह जगह डैमो को स्वीकृति दी उस वक्त तो आप लोगों को याद नही आयी पहाड़ की भौगोलिक स्थिति । आपने 10-10 टायर वाले भारी ट्रक उन्ही आठ फूट की सड़कों पर दौड़ाए , भूल गये क्या और मिला क्या बदले में ? उत्तराखंड को पांच रुपये यूनिट बिजली व रोजगार बाहर के लोगों को । शर्म करो कुछ, 26 - 27 डैम एक राज्य में होने के बाद भी दिल्ली बराबर बिजली मूल्य और आप चैन की नींद ले रहें हैं । पहाड़ पर रहने वाले नागरिक इस राज्य का प्रथम नागरिक है वह नही होता तो आज आप एक अलग राज्य के राजा नही होते । याद करो उत्तराखंड से पहले की घटनाओं और आंदोलनों को और समीक्षा करो कि कितने पहाड़ी लोग शहीद हुए और कितने मैदान के ? आप शायद भूल गये होंगे हम नही भूले ।
अफसोस बहुत है लेकिन, उत्तराखंड पहाड़ी क्षेत्र का नेता पहाड़ के विकास की बात सिर्फ मैदान में रहकर करता है । अपने पैसों से विदेशों में जमीन खरीदता है लेकिन गढ़वाल को पराया समझता है । अगर मैं गलत हूँ तो कितने नेता हैं जिनके पहाड़ पर अपने गांव में घर सलामत हैं ? कितने नेता हैं जिनके परिवार आज भी गांव में रहना तो दूर की बात , जाते भी हों ? और आप लोगों में तो इतना विवेक भी शायद बाकी नही रहा कि जब सम्पन्न व्यक्ति को ही वहां रहने में दिक्कत है तो वह बेचारा कैसे रहेगा जिसके पास गाड़ी घोड़ा भी नही है । क्या करोगे सड़को का ? जब उच्च स्तर के हस्पताल देहरादून में ही हैं ।
" राजा का अनुसरण प्रजा करती है, जिस राज्य (गाँव समझ लीजिए) का राजा ही भाग गया हो उस राज्य में प्रजा की स्थिरता की बात सोचना, मुझे लगता है यह सही नही है ।"