उरख्यालू और गिंजालू उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में धान जैसे मोटे अनाज की कुठाई के लिए प्रयुक्त होने वाली पत्थर और लकड़ी का संयुक्त देशी तकनीक है। यह कुमाऊँ में किस नाम से सम्बोधित होती है इसकी मुझे जनकारी नही है । इस तकनीक में उपयोग में लाया जाने वाला उरख्यालू पत्थर से निर्मित एक 10 इंच से लेकर एक फीट का गड्डा होता है तथा यह पत्थर के मध्य भाग में स्थित होता है । यह छेद ऊपर से अधिक व्यास तथा नीचे से कम व्यास का होता है । इस तकनीक में उपयोग होने वाला गिंजालू लकड़ी से निर्मित एक लगभग चार से पांच इंच व्यास की रॉड होती है जिसके निचले हिस्से पर लोहे का एक गोल छल्ला फिक्स होता है । इस रॉड की लम्बाई 4 फ़ीट से 6 फीट तक होती है और मध्य भाग पर पकड़ के लिए इसके व्यास में हल्की सी कमी की जाती है । दोनों को आप चित्र में देख सकते हैं ।

प्राचीन समय में जब चक्की जैसे उपकरण नही थे या बहुत कम थे, उस वक्त उत्तराखंड के लोग पत्थर के उपकरणों से ही कुठाई और पिसाई के कार्य करते थे । पीसने के लिए तो फिर भी पानी से चलने वाले घ्राट कहीं कहीं मिल जाते थे, किन्तु कुठाई के लिए यही तकनीक सबसे कारगर साबित होती थी । यह उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में लगभग हर घर में मिलता था । यह इमामजस्ता प्रक्रिया का ही बड़ा स्वरूप है । लेकिन आज लगभग यह विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गया है, क्योंकि अब न गढ़वाल में चक्कियों की कमी है और न कोई उतनी मेहनत करना चाहता है । हां कुछ स्थानों पर गढ़वाल में "आर्से" बनाने में प्रयुक्त चावल सामग्री को बनाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है । दूसरा कुछ स्तनों पर शादी कार्य में इसकी पूजा का महत्व है इस कारण गांव में एक-दो घरों में यह दीन हीन अवस्था में देखने को मिल ही जाता है । अन्यथा वहां पर भी लोग इमामजस्ता पूजा से ही अपने पूजन कार्य को पूर्ण करने लगे हैं ।
इस तकनीक में दो व्यक्ति एक साथ या अकेले अकेले कार्य कर सकते हैं । इस तकनीकी में कुठने वाले अनाज को पत्थर में बने छेद में डाला जाता है उसके बाद व्यक्ति को गिन्जाले (लकड़ी की रॉड) को मध्य भाग से पकड़ कर हल्की ताकत के साथ खड्डे में अनाज के ऊपर मारना होता है जिससे जीरी (साट्टी) से चांवल अलग हो सके । इस प्रक्रिया को दो व्यक्ति क्रमानुसार चोट मारकर भी पूर्ण कर सकते हैं । जब तक पहाड़ों पर चक्की जैसी तकनीक का विकास नही हुआ था या लोगो को इसको करने का अभ्यास था तो यह लगभग हर दिन किया जाने वाला कार्य था ।
इस देशी तकनीक के फायदे :- इस तकनीक के दो बेहतर और सबसे बड़े फायदे थे, जिनके लिए आज लोग अतरिक्त पैसा चुका रहे हैं ।
१- भरपूर शाररिक कसरत :- इस प्रक्रिया में हाथों की मसल्स को जो शक्ति प्रदान होती थी वह बिल्कुल निःशुल्क कसरत थी और कसरत के साथ साथ एक और महत्वपूर्ण कार्य भी पूर्ण हो जाता था । जबकि आज हाथों व पैरों की कसरत के लिए लोग शहरों में कसरत खानों में जाते हैं और वहां अच्छा खासा शुल्क देकर भी उतना स्वास्थ्यवर्धक जीवन नही जी सकते हैं ।
२- पैसों की बचत :- इस कार्य को करते हुए व्यक्ति तीन तरह से पैसे बचा लेता था । पहला जो मशीन द्वारा कुठाई पर शुल्क देना था । दूसरा जो आपने कसरत पर अतिरिक्त शुक्ल दिया और तीसरा यह हर दिन या हफ्ते में तीन से चार दिन होने वाली प्रक्रिया थी जिस वजह से शरीर को सुदृढ़ता मिलती रहती थी और आप अधिकतम पसीना बहा के स्वस्थ बने रहते थे जिससे हस्पतालों के छोटे मोटे खर्चे भी बच जाया करते थे ।
इतना उपयोगी होने के बाद भी यह पौराणिक धरोहर आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है क्योंकि आज गांवों में लोग ही नही रहे तो यह पत्थर से बना उपकरण कैसे सुरक्षीत रहेगा । जिसको हमारे पूर्वजों ने कितनी मेहनत से बनाया होगा, इसका आंकलन आज की पीढ़ी नही कर सकती है । क्योंकि उनको लगता है छेद करने वाली मशीन से दो मिनट में पत्थर पे छेद बन जाता है । लेकिन जिस वक्त उन पत्थरो पर छेद बनाये गये तब दो दिन या उससे अधिक लगे थे, यह समझाना भी मुश्किल हो जाएगा ।