मनुष्य जीवन कल्पनाओं का एक ऐसा सागर है जिसमें वह जितना डूबता है उसकी खुशी उससे भी नीचे निहित होती नजर आती है। विज्ञान चाहे कितनी भी तरक्की क्यों न कर ले लेकिन होगा वही जो इस प्रकृति या यूं कह लो आपकी प्रकृति में निहित है। आप अपनी खुशी को कैसे परिभाषित करते हैं इसके दो आयाम हैं। पहला कि आप सिर्फ उनको खुशी मान बैठे हो जो आपके अधिकार क्षेत्र में हैं, जबकि वह आपके दुःख हैं। दूसरा जो आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं हैं और जिनमें आपकी खुशी निहित है। अब आप सोच रहे होंगे ये तो समझ से परे है। लेकिन यही सच है। इस लेख को पूरा पढ़ने के बाद आप समझ जाएंगे कि जिसको आप खुशी समझ रहे हो, वह दरअसल आपके कर्म से बाहर का विषय है।
जीवन क्या है ?
कोशकीय शरीर में वृद्धि (सजीवता) होना ही जीवन हैं। हम जीवन का मूल्य जीवों और इंसानों की दृष्टि से देखते हैं। जबकि जीवन तो वनस्पति में भी है, और केवल वनस्पति ही नही ऐसे कई जन्म जिनमें जीवन है। मान्यताओं पर ध्यान दें तो सनातन धर्म संस्कृति में ही 84 लाख योनियों का बखान मिलता है। ये सब जीवन ही तो है। जिसको किसी न किसी रूप में यातना दी जा सके या सताया जा सके। अब भले ही इस जीवन को इंसान ने विवेक के अनुसार कई स्वरूप में व्यक्त किया है लेकिन जीवन का अर्थ सम्पूर्णता में इतना ही परिभाषित होता है। भौतिक चक्र में जो जिस प्रकार का भोजन ग्रहण करता है वह भोजन उसी स्वरूप में उसका विकास करता है, यह जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार है। उदाहरण के लिए आपने आम खाया तो उसने आपको आम के गुणों में नही ढाला या आपने मांस खाया तो उसने आपको उस स्वरूप में नही ढाला, बल्कि आपने जो खाया उसको अपने स्वरूप में ढाला दिया। आपका दुःख केवल इतना हो सकता है कि अरे यार मैंने बहुत दिनों से मुर्गा नही खाया या पनीर नही खाया, लेकिन इतने दिनों में आपने जो भी खाया वह बराबर आपने आपका स्वरूप बनता रहा यह खुशी है, लेकिन आपके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
आपके दुःख जो आपके अधिकार क्षेत्र में हैं ?
अब आप इतना तो समझ गए हैं कि इस धरती पर जीवन सिर्फ आप ही नही हैं। हजारों नही बल्कि लाखों की संख्या में अन्य जीव भी जीवन चक्र को पूर्ण कर रहे हैं, वह भी बिना किसी शिकायत के। फर्क सिर्फ इतना है कि बाकी जीव जिस दुःख के साथ पैदा होते हैं उसी के साथ अंत तक संघर्ष करते हैं जबकि इंसान लगातार अपने दुःखो में विस्तार करता है यह समझ के कि वह अपने सुखों में विस्तार कर रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य की खुशियां अलग अलग समय पर अलग अलग होती हैं। जबकि वह उसके वश में नही होती, फिर भी मनुष्य विस्तार पर जोर देकर रखता है। उदाहरण के लिए- आपने पढ़ाई की और नौकरी लग गए, क्यों ? क्योंकि सुंदर लड़की से शादी करनी है और वंश को आगे बढ़ाना है, समाज मे रुतबा बनाना है इत्यादि। अगर ये कहें कि यह सब आपके दुःख थे, तो कैसा रहेगा ? शायद आपको समझ नही आया होगा।
यह सब वह है जो आपके अधिकार क्षेत्र में हैं। अब अगर शादी हो गई और संतान सुख की प्राप्ति नही हो रही तो इसको आप क्या कहेंगे ? निश्चित रूप से दुःख कहेंगे। लेकिन पति में शुक्राणु का न बनना या महिला में मासिक धर्म का न होना किसी के हाथ मे है क्या ? तो समाधान क्या है, यही प्रश्न उठता है। क्योंकि शादी करना हाथ मे था तो दुःख है लेकिन जो हाथ मे नही है वह भी दुःख है। इस सवाल में ही उत्तर है कि आपके पास तो सिर्फ है ही दुःख, खुशी तो आपके अधिकार क्षेत्र में है ही नही तो करोगे क्या ? अब मनुष्य ने जिसको बनाया उसके पास जाओगे मतलब हस्पताल, हस्पताल क्या है ? एक सिर्फ मनुष्य ही है जो हस्पताल जाता है बाकी 83 लाख यौनियों के दुखों का निवारण कैसे होता होगा ? उन सुखों से जो उनके अधिकार क्षेत्र में नही हैं।
आप दुःखी हैं क्योंकि आपने पढ़ लिखकर मेहनत की फिर शादी की लेकिन सन्तान का सुख नही मिला। आपके पास हस्पताल है और विज्ञान है फिर भी आपके हाथ मे केवल वही खुशी है जो भौतिकता में विद्यमान है। प्रयासों में हार ही तो दुःख है न ? लेकिन प्रयास इस धरती पर तुम अकेले तो नही कर रहे। क्या चिङिया घोषला नही बना रही ? क्या अन्य जीव अपना वंश नही बढ़ा रहे ? लेकिन अगर तुमने गलती से एक गाय भी रख ली और उसको भी बच्चा नही हुआ, तो तुम्हे दुःख रहता है कि इसको फोकट में पालना पड़ रहा है। लेकिन उसको बच्चा नही हो रहा यह तुम्हारे अधिकार क्षेत्र में तो नही है। तुम्हारे अधिकार क्षेत्र में दुःखी होना है और वह तुम आशानी से हो जाते हो।
आप सिर्फ उसी खुशी या सुख को प्राप्त कर सकते हैं जो आपके अधिकार क्षेत्र में हैं। जैसे आप पढ़कर एक अच्छी नौकरी या वेतन ले सकते हैं। यह आप कर सकते हैं क्योंकि यह आपके अधिकार क्षेत्र में हैं। इसको भौतिक खुशी या सुख कहते है।








