समीक्षा की शुरुआत मैं राज्यों के निर्माण भूमिका से करूँगा । क्योंकि परिस्थियां सबकी शुरुआती दिनों में एक जैसी ही थी, बल्कि ये कहूँ कि उत्तराखंड से खराब ही थी । सबसे पहले बात करूँगा उत्तराखंड के सीमांत राज्य हिमांचल प्रदेश की । हिमाचल प्रदेश का शाब्दिक अर्थ "बर्फ़ीले पहाड़ों का प्रांत" है। हिमाचल प्रदेश को "देव भूमि" भी कहा जाता है। दरअसल भारत में सभी पहाड़ी राज्यों पर देवी देवताओं के पौराणिक स्थल मिलते हैं । लेकिन उत्तराखंड, हिमांचल और जम्मू को पुराणों में देवी देवताओं का वास स्थल माना गया है इसलिए इनको "देव-भूमि" के नाम से जाना जाता था । समय के साथ साथ जम्मू-कश्मीर राज्य से ये टैग हट गया क्योंकि वह मुस्लिम बहुल हो गया । इस क्षेत्र में आर्यों का प्रभाव ऋग्वेद से भी पुराना है। आंग्ल-गोरखा युद्ध के बाद, यह ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के हाथ में आ गया। सन 1857 तक यह महाराजा रणजीत सिंह के शासन के अधीन पंजाब राज्य (पंजाब हिल्स के सीबा राज्य को छोड़कर) का हिस्सा था। सन 1950 मे इसे केन्द्र शासित प्रदेश बनाया गया, लेकिन 1971 मे इसे, हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम-1971 के अन्तर्गत इसे 25 जनवरी 1971 को भारत का अठारहवाँ राज्य बनाया गया । आज भी राज्य को विशिष्ट राज्य का दर्जा प्राप्त है व हिमांचल राज्य में बाहरी व्यक्ति के जमीन खरीदने पर प्रतिबन्ध है जो की अनुच्छेद 371 के तहत आता है ।

इसके बाद बात करते हैं जम्मू कश्मीर राज्य की । जम्मू-कश्मीर राज्य का गठन 26 अक्टूबर 1947 को किया गया जबकि इसको संविधान के तहत 26 जनवरी 1957 को लाया गया । हालांकि संविधान का गठन 17 नवम्बर 1956 को हो चुका था लेकिन विरोधाभाष के कारण इसमें देरी हुई । इस संविधान ले तहत स्थाई निवासी सिर्फ उसी को माना गया जो 14 मई 1954 से पहले वहां बसे हुए थे या जिसको उस वक्त तक जमीन पर अपना अधिकार प्राप्त था । तत्कालिक राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद और प्रधनमंत्री नेहरू ने नागरिकता से सम्बंधित एक अनुच्छेद बनाया जिसको 35A का नाम दिया गया । इस अनुच्छेद के तहत जम्मू कश्मीर में जमीन का अधिकार सिर्फ उसी व्यक्ति को रह गया जो 1954 से पहले वहां था । मतलब साफ था कि बाहरी व्यक्ति अब स्थाई नागरिकता हासिल नही कर सकता था । इसके साथ ही अनुच्छेद 370 (अनुच्छेद 370 सूची 21) को भी लाया गया, जिसका अर्थ था कि अब कोई भी दूसरे राज्य का व्यक्ति जम्मू-कश्मीर राज्य में जमीन स्थाई तौर पर नही खरीद सकता है और न ही राज्य का नागरिक बेच सकता है । जम्मू कश्मीर राज्य में विशिष्ट राज्य अनुच्छेद 370 इसलिए है क्योंकि उनको भारतीय संविधान से अलग अधिकार प्राप्त थे या यूं कहो की संविधान ही अलग था । क्योंकि सम्पूर्ण भारत में विशिष्ट राज्य का दर्जा 371 अनुच्छेद के अंतर्गत दिया गया है । खैर यह बहुत दीर्घ विषय है जो की मेरी समीक्षा का विषय नही है । वर्ष 2019 में बीजेपी सरकार द्वारा "जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक" लाया गया । राज्यसभा व लोकसभा में पास होने के बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द द्वारा हस्ताक्षर कर 06 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर में लागू किया गया । इस विधेयक ने जम्मू-कश्मीर से लद्दाख को अगल कर दिया और दो अलग अलग केंद्र शासित राज्य घोषित कर दिया । आज राज्य में देश का कोई भी नागरिक जमीन खरीद सकता है और स्थाई निवास ले सकता है ।
अब बात उत्तराखंड की । उत्तराखंड 28 अगस्त 2000 तक उत्तर प्रदेश राज्य के अधीन था । लेकिन इसी तिथि को तत्कालीन राष्ट्रपति आर.नारायण ने "उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक" पर हस्ताक्षर कर उत्तरांचल को देश के 27वें राज्य के रूप में मंजूरी दे दी । इसके बाद 9 नवम्बर 2000 को राज्य अस्तित्व में तो आया लेकिन इस राज्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा कि राज्य की मांग में बहुत अधिक आंदोलन हुए और सैकड़ों लोग काल के गाल में समा गये । उससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह रहा कि राज्य की पृष्ठभूमिका ही गलत तरीके से रखी गयी । गोविंदबल्लभ पंत जैसे लोगों की बातों को दरकिनार करके, कुछ लोगों ने राज्य की मांग तो उठाई लेकिन राज्य को जो अधिकार मिलने चाहिए थे वो नही मिले और राज्य संघर्ष की कहानी बन गया । किसी ने भी वह नही सोचा जो हिमांचल व जम्मू-कश्मीर के नेताओं ने राज्य के सर्वोच्च हित के लिए सोचा और विकास की राह पे आगे बढ़ गये । पिछड़ गया तो बस उत्तराखंड । वह उत्तराखंड जो आधे देश को पानी देता है, वह उत्तराखंड जो आधे देश को बिजली देता है, वह उत्तराखंड जो सर्वाधिक मन की शांति देता और वह उत्तराखंड जो भड़ो (वीरों) और बुद्धिमान लोगों के लिए जाना जाता है ।
उत्तराखंड बनाम हिमांचल :- दोनों ही राज्यों के आगे एक ही तरह की भौगोलिक स्थिति है । लेकिन आज हिमांचल रोजगार, पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा, पहाड़ी क्षेत्रों में नागरिकों की संख्या और पहाड़ों पर आधारभूत सुविधाओं में उत्तराखंड से बहुत बेहतर स्थिति में है । वजह ? वजह है उन लोगों की समझदारी जिन्होंने राज्य की बागडोर शुरुआती दिनों में सम्भाली और राज्य के हित मैं फैसले लिए । उत्तराखंड में नेता तो पहाड़ से जरूर हुए पर वो नेता होने के बाद पहाड़ी नही रहे । इसकी भी बहुत बड़ी वजह थी, जो लोग इस राज्य को केंद्र शासित करना चाहते थे जब उनकी सुनी नही गयी तो वे हट गये और बच गये वो लोग जो कव्वा बांट कर राज्य को लूटना चाहते थे । अंत में वही कामयाब भी हो गये । पहले तो उत्तराखंड की स्थिति बाकी पहाड़ी राज्यो से भिन्न थी, ऊपर से उत्तर प्रदेश ने साफ कर दिया किया व्यय चुकाना पड़ेगा । बस फिर क्या था ? गोविंदबल्लभ पंत जो चिल्ला चिल्ला के कह रहे थे कि संसाधनों की कमी है, ऐसा मत करो । अब वही बचे संसाधन कर्जे चुकाने के काम में लाये गये । क्योंकि राज्य केंद्र शासित तो हुआ नही इसलिए जो थोड़ा बहुत पैसा राज्य हित में आया भी, नेता बाँटकर खा गये । नतीजा ? पहाड़ो तक पैसा पहुंचा नही । तो "विकास" भाई देहरादून में ही रुक गया । जब लोग पहाड़ो पर शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओ से परेशान हो गये तो चले आये देहरादून व अन्य राज्यों के "विकास" को देखने ।
देहरादून में किसका विकास हुआ:- देहरादून में भी पहाड़ी नागरिक का विकास नही हुआ । यहां विकास हुआ उन लोगों का जो थे तो उत्तर प्रदेश या मैदानी इलाको के लेकिन राज्य गठन के बाद यहीं रह गये । ऊपर से सरकारों में बैठे महाज्ञानी लोग जिन्होंने इसको विशिष्ट राज्य भी नही रहने दिया और 371 हटा दिया । पहाड़ी नगरिक के पास तो पैसा था नही क्योंकि वो गांव में खेती बाड़ी से अपना और परिवार का पेट भर रहा था और उन चरमराई व्यवस्थाओं पर निर्भर था जो सरकार देती थी । ऐसे में राज्य के मैदानी इलाको की मुख्य जगहों पर दूसरे राज्य से आये लोगों का कब्जा हो गया । पहाड़ी तो उस वक्त किरायादार बनके आया जब विकास के नाम पर विनाश शुरू हो चुका था। सबसे मझेदार बात तो यह है कि नेता हमारे ही पहाड़ का था/ है । लेकिन वो आज तक पहाड़ियों को मूर्ख बनाने में लगा हुआ है । आखिर जब हिमांचल के पहाड़ो पर कम्पनियां स्थापित हो सकती हैं वो भी अस्थाई रूप से तो उत्तराखंड में क्यों नही ? 26 बाँध परियोजनाओं के बाद भी दूसरे राज्य बिजली मुफ्त बाटने का दावा कर सकते हैं, तो उत्तराखंड के पहाड़ी नागरिक क्यों पैसा दें ? आखिर उनकी तो जमीन और गांव के गांव बरवाद किये हैं । देहरादून जैसी जगाहों में भी रोजगार के लिए क्या है ? कुछ नही, हाँ भीड़ है तो लोग दुकानें कर रहे हैं या उन दूसरे लोगों के यहां गुलामी की नौकरी जो दूसरे राज्यों के नागरिक यहां आकर बसे हैं/थे ।
क्यों नही हो सकता उत्तराखंड का विकास:- इतिहास गवाह है, राजशक्ति जहां जहां जाती है उस स्थान का विकास होता है । जब तक राजधानी देहरादून है, पहाड़ों का विकास नही होगा । राज्य को अनुच्छेद 371 को लागू करना चाहिए । अन्यथा उत्तराखंड का मूल निवासी पहाड़ी नागरिक, का विकास नही होगा । क्योंकि घूसखोरी के चक्कर मे कोई भी कार्य राज्य से बाहर के नागरिक को दिया जाता है और मूल निवासी वंचित रह जाता है । राज्य में किसी भी बाहरी व्यक्ति को जमीन स्थाई रूप से आवंटित न की जाए । पहाड़ी क्षेत्र को आधारभूत सुविधाओं से सुसज्जित किया जाए लेकिन ऐसे खाना पूर्ति के लिए देहरादून से योजनाएं बना के नही कि हर 10 किलोमीटर पर स्कूल खोल दो। ऐसी बंदरबांट स्कीमों से सिर्फ नेता ही पैसा खा सकता है जनता को सुविधा नही मिलेगी । अपने राज्य के धनवान लोगों को उद्योगों के लिए प्रोत्साहित किया जाए (उनको विशिष्ट छूट दी जाए) लेकिन रोजगार सिर्फ राज्य के युवाओं को ही देना होगा यह शर्त रखी जाए, अन्यथा उद्योग स्थापित होना असम्भव है । नेताओं को राज्य से बाहर जमीन या प्रॉपर्टी खरीदने का अधिकार नही होना चाहिए । क्योंकि जब आप जनता की सेवा के नाम पर सत्ता में आए हैं तो राज्य से बाहर कारोबार क्यों ? यदि आप चोर हैं तो आपको नेता रहने का अधिकार नही मिलना चाहिए । नेता का घर उसके गांव में भी हो और उसका परिवार का कोई न कोई सदस्य अपने परिवार के साथ वहां रहता हो तथा वही सुविधाओं का सुखभोग करे जो आम जनता के लिए हों, अन्यथा गांव समृद्ध नही होंगे । और जब तक उत्तराखंड राज्य के गांव समृद्ध नही होंगे, राज्य का विकास नही होगा ।