आज क्यों सोचना पड़ रहा है कि हम भारतीय हैं ।




यह समीक्षा पढ़कर भी अगर आपको लगे कि आप उस भारत के ही वासी हैं जिसकी संस्कृति सनातन धर्म थी, है और जब तक धरती पर जीवन है तब तक रहेगी । तो देश में सभ्यता के साथ आये लोग भारत पे कैसे हावी हो गये । मैं पूछना चाहता हूँ मेरे देश के कानून से कि इतना लाचार क्यों हो गया कि एक नही ,दो नही, दसों बेटियों की इज्जत से खेलकर मौत के मुँह में धकेल दिया गया और मुजरिमों को दलीलों पर छोड़ दिया गया । क्या यही है हमारा भारत ? मैं विचलित हूँ और भयभीत भी, आखिर एक बेटी इस देश में अकेले नही चल सकती तो कानून दलीलों पर कैसे चल रहा है । आखिर क्यों नही अब तक बलात्कार पर कानून बन सका या आप इंतजार में हैं कि जब एक और निर्भया कहानी दोहरायी जाएगी तब आप कुछ दिनों तक इस पर संसद में चर्चा करेंगे । अकेले वर्ष 2019 में 200 से अधिक बलात्कार के मामले उजागर हो चुके हैं फिर भी मेरे देश का कानून एक और के इंतजार में बैठा हुआ है।



आपने निर्भया में अपनी दलील में कहा कि एक आरोपी नाबालिक है लेकिन जिनकी सोच सारी हदें तोड़ चुकी हो उसके लिए नाबालिक का ठप्पा लगाना, हमारी संस्कृति के खिलाफ है । सभ्यताए वक्त के साथ बदलती रही हैं उसमें किसी राजा की क्या नीति थी इस विषय की संस्कृति से तुलना नही की जा सकती है । लेकिन जबसे भारत आजाद हुआ एक लोकतांत्रिक देश  है और अब हम सब भारतीय है जिसमें संस्कृति वाले भी है और सभ्यता वाले भी । इस विषय पर ( कौन संस्कृति का है और कौन सभ्यता संग आया ) समीक्षा शायद अब होनी भी नही चाहिए अगर देश को विकास की राह पर आगे बढ़ाना है तो, किन्तु लोकतांत्रिक देश का मतलब यह भी नही होना चाहिए कि  एक स्त्री विशेष के साथ संगीन अपराध होते रहें और हम बलात्कारियों की फांसी पर सिर्फ चर्चा करते रहें ।


सोचिए कैसी स्थिति में है हमारा देश जहां एक पेशे से डॉक्टर लड़की भी सलामत नही है । सिर्फ चन्द घड़ी की शाररिक भूख मिटाने के लिए कोई किसी को जिंदा या मारकर जला दे रहा है और फिर भी कई लोग पैसों के लालच में कई बार ऐसे लोगों का केस भी लड़ लेते हैं और कई बार आरोपी जमानत पर खुला घूम भी रहा होता है । यह सब देखकर सोचना पड़ रहा है कि हम भारतीय हैं । भारत पिछले कुछ सालों से नही अपितु युगों से पुरुष प्रधान रहा है और आज भी कहीं न कहीं वही सोच नजर आती है कि समाज परुष वादी सोच से निर्मुक्त नही हुआ है । और अगर हुआ होता तो आपने एक  भी पुरुष अग्नि परीक्षा (फाँसी) ली हुई होती तो आज निर्भयाओं की कहानी पर समीक्षा नही करनी पड़ती । इस देश में किस - किस के लिए आप मानक तय करेंगे ? नाबालिक भी रेप करता है, बालिका भी रेप करता है, बूढ़ा व्यक्ति भी रेप करता है, अनपढ़ भी रेप करता है, पढा-लिखा भी रेप करता है, जनता भी रेप करती है और नेता भी रेप करता है । क्या सबके लिए अलग अलग नियम लागू करवाये जायेंगे ? और शायद हो भी यही रहा है हमारे देश में शिवाय औरत को शाररिक सुख का सामन समझने के । कहाँ की संस्कृति और किसकी शिक्षा अब तो इज्जत बेचकर भी जान बचना मुश्किल हो गया है क्योंकि दलीलें स्त्री के दमन को चीर कर, उसके साथ रेप हुआ इसका सबूत मांगती हैं । लेकिन हमसे एक कानून तब भी लागू नही होता सहाब जब मुजरिम सामने खड़ा होता है । अब इसको भारतीय होने की लाचारी समझा जाय या दुर्भाग्य ?? यही सवाल है ।


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