आज उत्तराखंड के बहुत कम ही ग्राम पंचायत/ क्षेत्र पंचायत ऐसे होंगे जिनका ग्राम प्रधान/ क्षेत्र पंचायत सदस्य सही मानकों पर चुनाव लड़ रहे हों । पंचायत राज व्यवस्था में जो मानक थे अगर उन पर नजर डाली जाय तो सरकारों ने अब तक कभी भी व्यवस्थाओं के सुचारू रूप से चलने पर ध्यान केंद्रित किया ही नही । इस व्यवस्था में था कि 52,000 मतदाताओं पर एक जिला पंचायत सदस्य अपनी उम्मीदवारी करेगा तथा 2000 पर क्षेत्र पंचायत व 1000 पर ग्राम प्रधान उम्मीदवारी करेगा और इसी आधार पर ग्रामसभाओं का वर्गीकरण किया गया था । आज स्थिति इसके विपरीत नजर आती है । जो लोग गाँव से बाहर निकल गये उनमें से आधी संख्या के तो मतदान पत्र ही गाँव के नही है और कुछ के ग्राम प्रधानों ने सिर्फ इसलिए रखवाए हुए हैं कि वे लोग उनको मतदान देने आ सकें । ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारें क्यों सोई हुई हैं ? और उससे भी बड़ा सवाल कि आखिर जब गांवों में जनसँख्या ही नही तो विकास कार्यों पर आया पैसा कौन डकार रहा है ? और सब कुछ पता होने के बाद भी सरकारें चुप क्यों हैं ? इन्ही सब सवालों के पीछे छुपा हुआ है ग्रामीण क्षेत्रों का विकास और नेताओं की ऐशो-आराम का राज, जिस पर से सत्ता पर्दा नही उठाना चाहती और पहाड़ी क्षेत्र स्वर्ग से नर्क की ओर अग्रसर है ।
क्या ग्रामीण क्षेत्रों को सही सर्वेक्षण की जरूरत नही है ? आप एक दशक की प्रतीक्षा वहाँ कर सकते हैं जहां जनसंख्या घनत्व बढ़ने का ही आंकलन हो लेकिन वहां तो बिल्कुल नही किया जा सकता जहां 1% भी इसके गिरने का आंकलन हो और ऊपर से उसमें निरन्तरता बनी हुई हो । इसको आप ऐसे समझये कि आपका शरीर का कोई हिस्सा सड़-गल रहा है तो आप डॉक्टर पे आज जाएंगे या दो दिन बाद और डॉक्टर आपका इलाज आज न करके 10 दिन बाद शुरू करे तो कैसा रहेगा ? या वह आपको बेड पर लिटा दे और आपका वह हिस्सा 1% की दर से खराब हो रहा हो, उस पर डॉक्टर कहे कि इसका इलाज अगले महीने की इसी तरीक से होगा , तो आप शायद उसका सिर फाड़ देंगे या आप समझदारी से काम लेंगे तो किसी दूसरे डॉक्टर पर चले जाएंगे, तीसरा अगर आप असमर्थ हैं तो आप वहीं पड़े पड़े मौत का इंतजार करेंगे या उसी के भरोसे पर रहेंगे । बस ठीक यही कहानी है भाई पहाड़ के लोगों की, जो लोग समर्थ थे वह दूसरी जगह चले गये । अब सिर्फ वही लोग हैं जो असमर्थ हैं और उसी सत्ता के भरोसे बैठे हुए हैं जो 10 वर्षों में एक बार जनगणना करके नागरिकों की संख्या गिन लेती है । लेकिन सवाल पर तो अभी बात हुई ही नही कि सरकारें सही सर्वेक्षण करती क्यों नही हैं ? और अब तक जो कोशिशें हुई भी उन पर पूरा कार्य क्यों नही किया गया ? यही तो समीक्षा का मुख्य विषय और वजह है ।
वजह तो इसकी बहुत सारी हैं किन्तु हम तो केवल उन वजहों पर समीक्षा करेंगे जिनके बिना पहाड़ों विकास सम्भव ही नही है । इसका पहला और सबसे बड़ा कारण है नेता, जिला पंचायतों, विभाग के सदस्यों व क्षेत्रीय सभा सदस्यों का निजी हित में सोचना तथा दूसरा कारण है उच्च विश्लेषण वाले वर्ग का ग्रामसभाओं में न होना । मुझे लगता है अगर राजनीति के यह दो चरण सुधर जाये तो पहाड़ों की स्थिति में सुधार होने लगेगा । अब आप सोच रहे होंगे की दूसरा चरण राजनीतिक कैसे हो गया ? तो आप बिल्कुल सही सोच रहें हैं । यही हम इस समीक्षा में सिद्ध करेंगे कि यह हुआ कैसे । आज जो लोग गांवों में रह रहे हैं उनको शायद पंचायत के त्रिस्तरीय चुनावों की राजनीति का स्तर मालूम होगा । जो लोग अच्छे विश्लेषक है उनका कहना है कि देश के सभी प्रकार के चुनावों का सबसे गन्दा स्तर आज पंचायत चुनाव का है । प्रधान के चुनाव में उठा प्रत्याशी भी 2 से 3 लाख खर्च कर रहा है, सवाल है कि क्यों ? इसकी वजह है कि अगर कम कम खा व खिला के भी पांच साल बिना काम करे निकाले जाए तो आराम से 5-6 लाख तो कम से कम बच जाते हैं और इतना तो बैंक ब्याज भी नही देता । लेकिन ऐसे काम उच्च विश्लेषक वर्ग नही करता और अगर कहीं कहीं होगा भी तो 2 से 3 प्रतिशत से अधिक आज भी नही होगा पहाड़ों पर । आज राजनीति के बाकायदा कोर्स होते है जिसने एक पंचवर्षीय योजना में प्रधान के साथ वक्त बिता लिया वह अगली बार प्रधानी के लिए उम्मीदवारी ठोक देता है । इसी तरह जिसने जिला पंचायत देख लिया वह विधायकी का सोचता है । मैं यह नही कह रहा कि यह गलत है लेकिन अगर शैक्षणिक योग्यता 8वीं या 10वीं हैं तो ऐसा व्यक्ति आप रटाये हुए रास्तों का अनुसरण तो कर सकतें है लेकिन आप कोई नया अपनी सोच का ऐसा कुछ नही कर सकते जिसके असफल होने का खतरा या तो बहुत कम हो या हो ही नही । लेकिन ऐसा तो कहीं नजर आता ही नही सरकारें उन्ही नारियों को आज ग्राम प्रधान बना रही हैं जिनको उनकी जवानी में सरकारों ने पढ़ाया ही नही और आज भी शिक्षा का स्तर पहाड़ों पर शहरों के मुकाबले का है ही नही तो आप किस नारी के सशक्तिकरण की बात कर रहें ? जिसका केवल नाम उपयोग में लाकर चुनाव लड़ा जा रहा है और बाकी काम उनके पति देख रहें हैं । आपने कभी सोचा कि राजनीति में पढ़ा लिखा वर्ग क्यों नही आगे आया ? यहीं राजनीति शुरू हुई । इसके दो बड़े कारण थे पहले से सत्ता पर बैठे लोग किसी सशक्त व्यक्ति को नही घुसना चाहते थे/ हैं और दूसरा जिसमें विश्लेषण की ताकत है वह अच्छा पढ़ा लिखा व्यक्ति किसी के आगे झुकना नही चाहता और उसके लिए राजनीति कीचड़ है क्योंकि सच्चाई भी यही है कि राजनीति में गिने चुने ही लोग हैं जिनके चेहरे साफ हैं । तो इस तरह से राजनीतिक तरीके से नेताओं ने पढ़े लिखे वर्ग को प्रणाली से हटा दिया और धीरे धीरे भ्रष्ट लोगों ने आपने पाँव सभी विभागों, ग्रामसभाओं में फैलाने शुरू कर दिए । परिणाम यह हुआ कि आज विभागीय अफसर 2% ऐसे खा लेता है जैसे गेहूं में पिसा हुआ घुन। किसी को पता ही नही चलता बस सरकार केवल अफसोस करती है कि विकास क्यों नही हो रहा जबकि उसी मैं बैठे लोग विकास वाला हिस्सा खा के देहरादून मे बैठे हैं ।
" बस यही कारण हैं कि सरकार सही सर्वेक्षण नही करती क्योंकि गलत व्यक्ति कभी कड़वा नही बोलता और उस कड़वे व्यक्ति में पहाड़ का सही सर्वेक्षण छुपा हुआ है ।"