उत्तराखंड पहाड़ी लोग कैसे बने देहरादून व अन्य शहरों में कैदी ?



आज की स्थिति को देखते हुए लगता है कि 2050 तक देश की 70% आबादी नगरों में बस ही जाएगी तथा केंद्र सरकार ने जनसँख्या के स्थरीकरण को 2045 से बढ़ाकर जो 2070 किया वह भी सही फैसला है क्योंकि यह काम तो सरकार 2070 छोड़िए 2099 तक भी नही कर पाएगी और न जाने उसके बाद भी होगा की नही । अगर ऐसा हुआ तो राजनीति में भूचाल आ जाएगा और बहुत सारे नेता बेरोजगार हो जाएंगे ।


आज पहले एक कहानी सुनाता हूँ मैं आपको, कि आराम का आधी व्यक्ति या जीव कैसा होता है । एक राजा एक बार अपने राज्य से कहीं भ्रमण पर निकला । जब वह किसी दूसरे राज्य में गया तो वहाँ उसने देखा कि एक व्यक्ति के पास दो बड़े सुन्दर सजीले बाज पक्षी हैं जो हमेशा उसी के पास रहते हैं । राजा को बाज बहुत पसन्द आये तो राजा ने उस व्यक्ति से कहा की यह बाज मुझे दे दो और मुँह मांगी कीमत ले लो । यह सुनकर वह गरीब खुश हो गया और उसने दोनों बाज राजा को बेच दिए । कुछ समय पश्चात जब राजा अपने राजमहल पहुंचा तो उसने बाजों के पैरों में बारीक व बहुत लम्बी रस्सी बांधी और खुला छोड़ा, एक बाज तो सीधा उड़कर आकाश की तरफ गया लेकिन दूसरा महल में स्थित पेड़ पर जाकर बैठ गया । राजा ने सेवकों से कहकर उसको उड़ाना चाहा पर वह नही उड़ा ।  दूसरे दिन राजा ने जब पुनः दोनों को छोड़ा तो एक उड़ गया दूसरा जाकर पेड़ पर बैठ गया और वहीं बैठा रहा । यह देख राजा चिंतित हो गया की आखिर यह उड़ता क्यों नही है । राजा ने बाज को बैद्य से दिखाया की इसकी तबियत तो खराब नही है ? लेकिन बैद्य ने कहा माहराज यह पूर्ण रूप से स्वस्थ है । इस पर राजा ने पूछा कि फिर यह उड़ क्यों नही रहा ? तो बैद्य ने कहा कि हे राजन ! फलाने गाँव में एक व्यक्ति रहता है उसके पास मैंने कुछ पक्षी देखे थे । आप एक बार उसको बुला लीजिए शायद वह इस समस्या का हल बता दे । राजा ने कहा ठीक है और राजा ने उस आदमी को बुलाने के लिए सेवकों को भेजा । वह व्यक्ति राजा के पास आया तो राजा ने उसको पूरी कहानी सुनाई और कहा की अब हल बताओं ? और अगर आपने यह कारनामा कर दिया तो आपको उचित उपहार दिया जायेगा । इस पर उस आदमी ने कहा कि हे माहराज इनको कुछ वक्त के लिए मुझे दे दो और ठीक 15 दिन बाद आप घूमते हुए मेरे पास आके इनको ले जाना । राजा मान गया और उसने दोनों बाज उस व्यक्ति के हवाले कर दिए । वह व्यक्ति उनको लेकर घर पहुंचा तो उसने भी दोनों के पैर रस्सी से बाँधे और उनको उड़ाया तो एक तो ऊपर आकाश में उड़ने लगा किन्तु दूसरा थोड़ा दूर जाकर पेड़ पर बैठ गया । दूसरे दिन पुनः जब उसने उनको उड़ाया तो वह फिर उस जगह पर जाकर बैठ गया । तीसरे दिन उसने फिर दोनों बाजों को उड़ाया तो एक उसी पेड़ पर जाकर बैठ गया । चौथे दिन उस व्यक्ति ने एक काम किया , उसने वह पेड़ जड़ से काट दिया और फिर वह घर आया और उसने उड़ने वाले बाज पे तो लम्बी रस्सी बांधी किन्तु जो बाज बैठ जाता था उस पर सिर्फ उतनी ही लम्बी रस्सी बांधी जो उस पेड़ तक पहुंचती थी जहाँ वह बैठ जाता था । और फिर उसने दोनों को उड़ाया तो एक तो सीधा आकाश की तरफ गया लेकिन दूसरा सीधा उसी पेड़ की तरफ गया किन्तु उसको वहाँ पेड़ नही दिखा तो वह घर की तरफ लौटा और वहाँ से व्यक्ति ने उसको फिर से उड़ा दिया । यह प्रक्रिया वह अगले तीन - चार दिन दोहराता रहा । नौवें दिन उसने दोनों को समान रस्सी से बंधा और उड़ाया तो दोनों एक ही दिशा में उड़े और काफी देर साथ साथ उड़ते रहे । 16वें दिन राजा आ धमके और राजा ने कहा हाँ भाई ! कहाँ है मेरे बाज ? व्यक्ति ने दोनों बाजों के पैरों को समान रस्सी से बांधा और उड़ाया तो दोनों सीधा आकाश की ओर उड़े, यह देखकर राजा बहुत खुश हुआ और उसने कहा की मैं तुम्हारे इस हुनर से बहुत हर्षित हूँ और कल तुम राजमहल आके अपने इनाम ले जाना । किन्तु उससे पहले मैं यह जानना चाहता हूँ कि आपने यह कार्य किया कैसे ? वह व्यक्ति बोला हे राजन ! मैंने पहले दो - तीन दिन जब इसको उड़ाया तो यह वहां दूर जाके पेड़ पर बैठ जाता था । अगले दिन मैंने वह पेड़ ही काट दिया जिसको यह अपने आराम का सहारा बना बैठा था और फिर अगले तीन - चार दिन मैंने इसको यहाँ से वहीं तक उड़ाया और दिन में कई बार उड़ाया तो इसने अपना आलस त्याग दिया और इसको अपनी उड़ने की क्षमता का एहसास हो गया तो यह उड़ने लगा है । " राजा को भाव समझ आ गया कि जरूरत से ज्यादा सुविधाएं कभी कभी अपनी क्षमता के सही बोध से वंचित करवा देती हैं" और राजा ने दूसरे दिन उस व्यक्ति को कुछ स्वर्ण मुद्राएं उपहार स्वरूप दी ।

अब आप सोच रहे होंगे कि इस कहानी का पहाड़ी लोगों से क्या सम्बंध और पहाड़ी कैदी कैसे हो गये देहरादून या अन्य शहरों में जाकर ? सही सोचा आपने । बात यह है कि जब कोई व्यक्ति किसी अपराध में लिप्त होता है तो उसको सजा होती है और उसको कैदी कहा जाता है । जेल में प्रत्येक कैदी का अपना एक नम्बर होता है और जब भी उससे कोई मिलने आता है तो उसकी एक पुस्तिका में नामदरजी करवाई जाती है । क्यों यही होता है न ? अब जो लोग पहाड़ से शहरों में आये और बहुमंजिला इमारतों में दो या चार कमरों में आये उनको आप क्या कहेंगे ? वह सब भी दिन भर अंदर दुमके हुए है और जब कोई मिलने आता है तो द्वार सेवक उनकी नामदरजी करवाता है की नही ? तो फिर फर्क क्या है उस कैदी और इन कैदियों में ? सिर्फ एक फर्क है वह दूसरे की मर्जी से कैद है और ये लोग अपनी मर्जी से कैद हैं । और कैद ऐसे हो गये हैं कि पिज्जा,बर्गर लेने भी नीचे नही उतर सकते हैं उसके लिए भी एक सेवक आके दरवाजे पे दे जाता है । इन्ही लोगों को सबसे पहले लगता है कि मेरे से पैदल नही चला जाएगा ठीक उस बाज की तरह जिसको लगता था कि पेड़ नही होगा तो शायद मेरे से उड़ा नही जाएगा ।


"मनुष्य जीवन चेतन है फिर भी लोग अचेतन में जाना चाहते हैं यही हमारी पहाड़ क्षेत्र समीक्षा का विषय है"






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