किस्मत क्या है ? और लोग क्यों किस्मत को दोषी मानते हैं, समझ लीजिए।

इस संसार में जन्म और मृत्यु के चक्र में सिर्फ इंसान नही फंसा हुआ है। हर वह जीव जिसने किसी भी स्वरूप में जन्म लिया और वह कोशकीय संरचना धारण करता है, का मृत्यु चक्र जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है। इंसान में विवेक के आधार पर तुलनात्मक क्षमता औरों से अधिक है इसलिए वह भले ही इसको अलग ढंग से परिभाषित करता हो लेकिन सच यही है कि वह लगातार मृत्यु की तरफ ही अग्रसर रहता है। यह बात अलग है कि वह इसको सकारात्मक दृष्टि के रूप में देखकर अपना जन्म दिन हर्ष से मना रहा है लेकिन यह भी सच है कि उसने अपने जीवन का एक वर्ष कम होने का उत्साह, उम्र के बढ़ते क्रम में मनाया है। खैर, यह एक अन्य विषय है, इस लेख में बात सिर्फ किस्मत की करेंगे।



किस्मत क्या है ?

किस्मत या भाग्य एक ही विषय है। अक्सर देखा जाता है कि लोग भाग्य/किस्मत पर दोषारोपण करते हैं। लेकिन जिसको लोग भूलवश या अज्ञानता में किस्मत/भाग्य कहते हैं दरअसल वह अधूरे कर्मों का परिणाम होता है या आप यूँ कह लीजिए कि वह अधूरे कर्म ही हैं। भाग्य वह है जिसमें आपकी भूमिका नहीं है। आपका भाग्य खराब हो सकता है अगर आपका जन्म स्वस्थ अवस्था में नही हुआ। क्योंकि इसमें न आपका जोर है और न आपकी मातृ शक्ति का। यह पूर्ण रूप से उस आलौकिक शक्ति पर निर्भर है जो आपके जन्म के लिए उत्तरदायी है और यही भाग्य है। भाग्य मतलब आपका पूर्व पुरुषार्थ। आप स्वस्थ पैदा हुए मतलब आप अच्छे भाग्य के साथ आये। अब भाग्य (पिछला पुरुषार्थ) खत्म हुआ और नया पुरुषार्थ कर्म के रूप में शुरू होगा।


अधूरे कर्म कैसे भाग्य कहलाते हैं ?

आप स्वस्थ जन्म लेते हैं तो आप अच्छे भाग्य के साथ इस धरती पर आते हैं। लेकिन जन्म के बाद मुनष्य अपने कर्मों के लिए स्वतंत्र भूमिका में नही होता है। मनुष्य विभिन्न प्रक्रिया में अपने माता-पिता, भाई-बहन या अन्य मनुष्य पर निर्भर रहता है। जबकि धरती पर अन्य प्राणियों में यह निर्भरता केवल जन्म के कुछ समय बाद तक ही देखने को मिलती हैं। मनुष्य इसको संरक्षण का नाम देता है लेकिन यहीं से वह अन्य द्वारा उसके साथ किये गए कर्मों का गुणा भाग में शामिल हो जाता है। वह जो चाहता है उसकी अहमियत से ज्यादा माता पिता जो चाहते है उसकी अहमियत होती है। माता पिता सोच रहे हैं कि वह अपना 100% दे रहें है जबकि बच्चा उसको पूर्णता से करने में सक्षमता नही दिखा रहा है।  बदकिस्मती से आज 90% मनुष्य इन्हीं कर्मों के साथ आगे बढ़ रहा है। जिसमें सफलता दर कम और असफलता दर ज्यादा है और यही अधूरे कर्म इस असफलता के लिए भाग्य की पुकार बन जाते हैं। माता पिता सोचते हैं हमारी किस्मत में ऐसा ही लिखा हुआ था और पुत्र सोचता है मेरी किस्मत में शायद यही लिखा हुआ था। जबकि सच यह है कि कर्म न माता पिता ने सही दिशा में किये और न पुत्र ने, फिर सफलता कैसे मिले।


इन अधूरे कर्मो से कैसे बचें ?

मनुष्य में अन्य जीवों से अधिक विवेक जरूर है लेकिन इसका उपयोग सही दिशा में कम और गलत दिशा में ज्यादा है। ऐसा नही है कि अन्य जीवों में बिल्कुल भी विवेक नही है लेकिन उनमें संरक्षण से ज्यादा सुरक्षात्मक जीवन के संघर्ष को लेकर चेतना है। जन्म के बाद ही आत्मनिर्भर के लिए अन्य जीवों में प्रेरणा देखी जाती है। जबकि मुनष्य में लंबे समय का संरक्षण लगातार मानसिक दुर्बलता को बढ़ावा देता रहता है। मानसिक दुर्बलता मनुष्य मन में कर्म से पहले ही सन्देह के लिए एक खास स्थान बना लेती है और मनुष्य के कर्मों के बीच कई प्रकार की शंकाओं का जन्म हो जाता है। इन शंकाओं में कुछ मानवीय संस्कार भी आते हैं। जबकि अन्य जीवों में ऐसा कुछ नही है, उनमें सिर्फ कुशलता के लिए जगह है और जो कुशल नही वह मृत्यु को जल्दी प्राप्त हो जाता है। इसके विपरीत इंसान अधूरे कर्मों के साथ भाग्य को कोषते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है।  

कर्म किसी धर्म या जाति के अधीन नही होता है। आपका कर्म ही आपका पुरुषार्थ है यानी कि भाग्य है। भाग्य का 90-95% अंशदान इसी धरती पर पूर्ण होता है, जैसे आपने कर्म किये होंगे। अब यह आप पर है कि आप चेतना रूपी इस विशाल सागर में लोहे रूपी कर्म लेकर आगे बढ़ेंगे या लकड़ी रूपी। आपके कर्मों में यदि पूर्णता होगी तो निश्चित रूप से आप इस भौतिक संसार के सर्वाधिक सुखों को प्राप्त करेंगे और यदि आपके कर्म हल्के होंगे तो आप आधे सुख और आधे दुःख में उस लकड़ी के समान आगे बढ़ेंगे जो आधे पानी में और आधे पानी से बाहर रहकर बहती रहती है। आपके कर्मों में पूर्णता आपके मानसिक स्तर पर ही निर्भर है, बस जरूरत ये है कि संरक्षण और आपके कर्म उसको कमजोर न कर रहे हों।


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