जनानी लैकी गौं बांजु ह्वेगी

कन कैकी छौं कटणु दिन शहरू मा भैजी
माछी सी हुयूँ प्राण कबलाणु च ऐंचा ऐंची ।
पर लौट नी सकदू गौं जन तालाब मा भैजी
जनानी बोनी, बच्चों कु भविष्य भी देखण हे जी ।।

द्वगमी मा फँस्यू च प्राण, कखन देखण खेत खल्याण
गौं की बात सुणदै जनानी चिल्लान्द, मीन मैत चलजाण ।
गर्म दूध होयूँ च, न थूकी सकदू न घूटी सकदौं भैजी
गुलामी की नौकरी कन्नू छौं पर फिर लग्यूँ छौं हाँजी हाँजी ।।

आध्धा से ज्यादा गौं जनान्यौ का बांझा कराया छन भैजी
फलाणु भी शैर मा चलेगी, हमुन कबरी जाण हे जी ।
सुणी-सुणी की कंदुड उस्यां छन गौं का छोरा का भैजी
धमकी पर धमकी मिलणी छै, मीन भी बोली चला आजी ।।

दोष नी येमा कैकू, अपणा ही छन बीज बूतियां भैजी
बांजा पड्या यूँ स्विण उंद, जौन मेरू गौं बान्जू ह्वेगी ।
चल खुट्टी तमासु कैथिक देखी औला खेल ह्वेगी भैजी
दम घुटेकी मरणु मंजूर होयूँ अर मेरू गौं बांजु रैगी ।।

# दिगम्बर डंगवाल



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