मातृ प्रेम की भावना में आकंठ डूबी 'सदेई' की गाथा एक अनन्य उदाहरण है, जिसने अपने पितृ गृह में भाई जन्मने की खुशी में अपने बच्चों तक की बलि देने को स्वीकार कर लिया था ।

गाथा की नायिका सदेई का विवाह अल्पायु में ही दूरस्थ गाँव थाती कठूड में हो जाता है । अपने ससुराल के ऊंचे पर्वत तथा घने बनो के व्यवधान के कारण वह अपने मायके को नही देख पाती है । भाई के न होने के कारण उसके पास मायके से किसी का आना जान भी नही हो पाता । अतः सदेई को निरन्तर अपने मायके की याद सताती रहती है । वह सोचती है कि काश मेरा भी भाई होता तो वह मुझे मायके जरूर बुलाता । वह अपनी कुलदेवी "झाली माता" के समक्ष विनती करती है कि हे देवी ! यदि तू मुझे भाई प्राप्ति का वर देदे तो मैं तुझे बलि चढ़ाऊंगी । कालान्तर में देवी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली । उसके मायके से उसके भाई के जन्म का समाचार मिला । जिसका नाम सदेऊ रखा गया । जब वह बड़ा हुआ तो उसके मन में भी यही भावना जागृत हुई कि काश ! मेरी भी कोई बहन होती । तब उसकी माँ ने बताया कि उसकी बहन सदेई है । जिसका विवाह दूरस्थ गाँव में किया गया है तथा कई वर्षों से वह मायके नही आ पायी है ।
एक रात सदेऊ को सपना होता है कि उसकी बहन किसी ऊँची पहाड़ी की चोंटी पर शीलंग वृक्ष के नीचे बैठी , भैया-२ पुकार कर अश्रु बहा रही है । वह उसी दिन अपनी बहिन के पास जाने के लिए उतावला हो जाता है ।घने बनों और नदियों को पार करता हुआ वह अपनी दीदी के ससुराल थाती कठूड पहुँच जाता है । बहिन से मिलाप पर दोनों के आँशु छलक पड़ते हैं । सदेई के दोनों पुत्र भी अपने मामा को देखकर अति प्रसन्न हो उठते हैं । कुलदेवी से मांगी मुराद के अनुसार सदेई ने अपने घर पर यज्ञ आयोजित किया । बलि का समय आया तो सहसा देवलोक से आवाज आती है - "पशु नही नर बलि चाहिए" । सदेई अपनी बलि देने को तैयार हो जाती है लेकिन शून्यलोक से पुनः आवाज आती है- "स्त्री बलि वर्जित है"। बलि देनी है तो अपने दोनों पुत्रों की बलि दो ।सदेई यह सुनते ही मूर्छित हो जाती है । किन्तु ढांढस बांधती हुई कहती है कि " मैं पुत्रों की ही बलि दूँगी" ।
कथाओं में लेख मिलता है कि तब उसने अपने दोनों बच्चों के कपड़े उतारे । बच्चों ने प्रश्न किया - "माँ हमारे कपड़े क्यों उतार रही हो?" सदेई उत्तर देती है - " तुम्हें स्नान करवा के नये वस्त्र पहनाऊँगी" । और कपड़े उतारने के बाद सदेई ने खड्ग उठाई और दोनों पुत्रों के सिर धड़ से अलग कर दिए । सभी इस काण्ड को देखकर स्तब्ध खड़े रह जाते हैं । मातृ हृदय सदेई ने पुनःदर्शन के उद्देश्य से दोनों सिर भीतर रख दिए तथा धड़ो को लेकर मंडप में उपस्थित हो गयी । तभी आकाशवाणी होती है, " सदेई बिना सिरों के धड़, देवी को नही चढ़ाए जाते हैं । सिरों को भी लेकर आओ" । सदेई व्यथित मन से पुत्रों के सिर लेने भीतर जाती है । वहां जाते ही उसकी खुशी का ठिकाना न रहा । उसके दोनों बेटे हंसी खुशी अपनी बाल क्रीड़ा में लीन थे । सदेई स्नेह पूर्वक आपने दोनों बच्चों को गले से लगा लेती है ।
यह कथा आस्था और विश्वास से ओत-प्रोत तथा अपने वचन के लिए प्रतिबद्धता की प्रेरणा है । यह केवल कहानी मात्र नही अपितु उत्तराखंड में घटित एक सत्य घटना पर आधारित है ।
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