मलेथा की कूल मध्य गढ़वाल की प्राचीन रोमांचकारी घटनाओं में सुमार है । मलेथा वर्तमान कृतिनगर ब्लॉक ले पास है । भड़ो (वीरों) में भड़ माधोसिंह भंडारी के शौर्य की कई गाथाएँ श्रीनगर राज्य काल में प्रसिद्ध हैं लेकिन त्याग की ऐसी गथा जो आज तक लोगों में प्रेरणा स्रोत बनी हुई है, नही मिलती है । मलेथा के सेरों (खेतों) तक बिना साधन व उपकरण के आश्चर्यजनक ढंग से कूल (नहर) का निर्माण किया जिसके लिए माधोसिंह ने अपने एकमात्र पुत्र गजेसिंह का बलिदान कर दिया ।

एक दिन जब महाभड़ (महावीर) माधोसिंह श्रीनगर राजदरबार से थके-हारे अपने गाँव मलेथा पहुंचे तो भूख से व्याकुल उन्होंने अपनी भाभी से खाने का आग्रह किया । भाभी उनको पानी के उपरांत रोटी तो परोस देती है लेकिन रोटी के साथ कोई सब्जी या दाल नही परोस पाती । भूख से तिलमिलाया माधोसिंह भाभी से सब्जी या दाल मांगता है तो भाभी ताना मरते हुए कहती है- तुम्हारे गांव में कौन सी पानी की कूल (नहर) है और सब्जियों की क्यारियां हैं, जिनमे शब्जियाँ उगी हों ? माधोसिंह को भाभी के यह शब्द अपमान जनक लगे और प्रतिक्रिया दी- आप ही क्यों कूल (नहर) निकालकर पानी नही लाती हो ? भाभी जवाब देती है- आपके जैसे भड़ (वीरपुरुष) के होते हुए अगर यह कार्य मुझे ही करना है, तो देवर माधोसिंह ! धिक्कार है तुम्हें । तुम्हारे रहते हुए अगर हम खेतों में हल चालएं तो तुम्हें चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए । तुमने एक क्षत्राणी की कोख से जन्म लिया है । तुम्हारा वीरत्व कहां गया ? आज के बाद अपने नाम के सम्बोधन में सिंह का प्रयोग मत करना देवर, नही तो लोग हंसी उड़ाएंगे । वह आगे कहती है कि इस धरती की सूखी काया पर एक दाना अनाज का नही उगता है । कूल बनाकर इन प्यासे खेतों तक पानी पहुंचाने में कितना वक्त लगेगा ? जिसको लगन हो वह क्या नही कर सकता है ।
दूसरे दिन माधोसिंह श्रीनगर राज दरबार में पहुंचता है । वहां भी राजा व दीवानों द्वारा मलेथा की सूखी पड़ी खेती के बारे में व्यंग्य किया जाता है । माधोसिंह को मन ही मन बहुत लज्जा आयी । हथियार से कटे घाव तो समय के साथ भर जाते हैं लेकिन अपमान के घाव आसानी से नही भरते । माधोसिंह का खून नसों में उभाले मारने लगा, वीर माधोसिंह ने ठान लिया कि जब तक मैं मलेथा की भूमि को सिंचित नही कर देता, चैन से नही बैठूंगा । माधोसिंह घर लौटता है और गंगा को साक्षी मानकर अपने भाभी के चरणों को पकड़ सौगन्ध करता है कि जब तक मेरे शरीर में एक भी बून्द खून की शेष रहेगी, मैं आकाश पाताल एक करके अपने गांव मलेथा तक कूल (नहर) निकालकर पानी लाऊंगा । मैं उस वक्त तक चैन से नही सोऊँगा जब तक मलेथा गांव के हर एक व्यक्ति का खेत सिंचित न हो जाए । माधोसिंह ने गैंती-फावड़ा (खुदाई के औजार) उठाये और अकेला ही सामने खड़े पहाड़ पर चढ़ गया । पहाड़ की दूसरी और चंद्रभागा नदी बह रही थी । माधोसिंह ने विचार किया, यदि इस पहाड़ को छेड़कर सुरंग बनाई जाए चंद्रभागा का पानी मलेथा तक पहुंच सकता है । यह कार्य बहुत मुश्किल था लेकिन माधोसिंह को खुद पर विश्वास था कि यह कार्य अवश्य पूर्ण होगा । अपने कुल देवी-देवताओं का स्मरण कर माधोसिंह इस असम्भव कार्य में अकेला ही जुट गया । कुछ दिनों के बाद लोगों ने उसका धैर्य और साहस देखा तो अन्य लोग भी सुरंग कार्य में जुट गये । घर पर माधोसिंह का ग्यारह वर्षीय इकलौता पुत्र गजेसिंह था । एक दिन वह अपनी माँ से पिता के साथ सुरंग खोदने जाने की जिद करता है । गजेसिंह की माँ उसको वहां न जाने की सलाह देती है किन्तु वीर पिता का वीर पुत्र किसी तरह वहां तक पहुंच जाता है । वहां पहुंच कर वह गांव के अन्य लोगों के साथ सुंरग कार्य में जुट जाता है । कार्य करते हुए एक भारी पत्थर गजेसिंह के सर पर आकर गिर जाता है (इसको लोग दैवीय माया मानते है) और गजेसिंह (माधोसिंह का अकेला पुत्र) हमेशा के लिए धरती की गोद में सो जाता है । पुत्र शोक जैसे बज्राघात से भी माधोसिंह अपने लक्ष्य से विचलित नही होता । उसने रात दिन एक करके कठोर पहाड़ में सुरंग बना के कूल (नहर) का कार्य पूर्ण कर दिखाया । मलेथा की सूखी जमीन पर पानी बहने लगा तथा गांव के खेत सब्जियों व अन्न से हरे भरे हो गये ।
ऐसे वीर पिता और वीर पुत्र पुत्र की गाथा उत्तराखंड में आज तक कठिन परिश्रम व त्याग की प्रेरणा स्रोत है । इन गढ़वाली बोली पंक्तियों के साथ मलेथा के लोग माधोसिंह और उनके पुत्र को आज भी याद करते हैं-
कन्नी छै भंडारी तेरी मलेथा ?
गौं मूडी को सेरो मेरी मलेथा ।
गौं माथि पँद्यारो मेरी मलेथा ।
ऐ जाणू रुकमा मेरा मलेथा ।
पालिंगा की बाड़ी मेरा मलेथा ।
लषण की क्यारी मेरा मलेथा ।
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