कुछ दूर तक हवा जब संग थी मेरे
मैं पतंग सा डोलता था आसमान में ।
बेखौफ उड़ता था में ऊंचाइयों पर,
पर लोग बेखौफ डोर नही छोड़ते थे ।।

माना था मैं रेत सा नाजुक तब
उड़ता था हवा के संग संग बेवजह ।
रेत यूँ फिसलती नही थी मुठ्ठी से,
गैर भी इंसानियत में जकड़ लेते थे ।।

बलखाता था मैं रास्तो पर कली सा
लोग उठा के सीधा कर जाते थे ।
पर काट के फेंका नही किसी ने,
तब लोग पेड़ का दर्द समझ जाते थे ।।

दुःख की पीड़ा सागर सा पानी
पार आसान नही होगा मालूम था ।
मझधार में होते थे लोग उस वक्त,
पर साथ ऐसे नही छोड़ जाते थे ।।

#दिगम्बर डंगवाल