तुम गीत मधुव्रत सा गुनगुनाते हो जब
मैं कली पुष्प सा फिर खिल जाता हूँ ।
तुम लूट लो तन से पराग बून्द बून्द
मैं सुर में तेरे बेसुद कहीं खो जाता हूँ ।।
देख कली कली मंडराता तुम्हें यूँ
मैं फिर मायूस होकर सिकुड़ जाता हूँ ।
भर ऊर्जा का नया संचार मन में
फिर अगली सुबह तुमसे मिला पाता हूँ ।।
तुम खूब हँसो और गुनगुनाओ
मैं चेतन मन में यही कल्पना करता हूँ ।
तुम बनो एक रानी मधुरता की
मैं तुम्हारे लिए ही तो प्राण रखता हूँ ।।
तुम्हारे सुरों की आदत हो गयी
बिन तुम साथियों में भी अनजान लगता हूँ ।
तुम रूठ कर देखो जाना नहीं
मैं जान जाने तक इसलिए पराग सँजोता हूँ ।।
तुम लूट लो तन से पराग बून्द बून्द
मैं सुर में तेरे बेसुद कहीं खो जाता हूँ ।।
देख कली कली मंडराता तुम्हें यूँ
मैं फिर मायूस होकर सिकुड़ जाता हूँ ।
भर ऊर्जा का नया संचार मन में
फिर अगली सुबह तुमसे मिला पाता हूँ ।।
तुम खूब हँसो और गुनगुनाओ
मैं चेतन मन में यही कल्पना करता हूँ ।
तुम बनो एक रानी मधुरता की
मैं तुम्हारे लिए ही तो प्राण रखता हूँ ।।
तुम्हारे सुरों की आदत हो गयी
बिन तुम साथियों में भी अनजान लगता हूँ ।
तुम रूठ कर देखो जाना नहीं
मैं जान जाने तक इसलिए पराग सँजोता हूँ ।।
#दिगम्बर डंगवाल

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