बहुत कुछ हार कर कुछ जीता हूँ
हुनर ए जिंदगी सब तेरा ही तो है ।
कोई मांगता है दिन रात सड़को पर
और मैं उन्ही से हर रोज गुजरता हूँ ।।

                  मैं वक्त के रहमोकरम पर हूँ, सख्सियत
                  वो सोचता तो होगा कभी जिंदगी को ।
                  हाँ सकून है उसे बिन बिस्तर सोने पर
                  मैं जिन रास्तों पर दिन रात भटकता हूँ ।।

खड़ा होता है जब वह हाथ पसारे
सवाल आखिर उसके भी पेट का है ।
उसको वक्त ने वही सिखाया तो क्या
मैं भी दिन रात पेट के लिए ही भटकता हूँ ।।

                    समझ नही आता हिसाब ए जिंदगी
                    मैं उम्रभर किसके लिए कमाता हूँ ।
                    वो सड़क पर ही शरीर छोड़ जाता है
                    मैं कोठियां बना के शरीर छोड़ जाता हूँ ।।

कर के मनका छोड़ दूँ तो क्या ?
क्यों न मन से मनका सिंच दूँ ।
वह भी तो वही कर रहा था सड़क पर
फिर भी मैं उसे दुत्कार चला जाता हूँ ।।

#दिगम्बर डंगवाल