इस तरह तेरे शहर को अपनाया है मैंने
क्या कहूँ कितने अरमानों को भुलाया है मैंने ।
पीकर घूंट सब्र का जी तो रहा हूँ जिंदगी मैं
जिंदगी ने कहाँ कहाँ रुलाया किसी से नही बताया मैंने ।

रूला के हँसा दिया इसी उलझन ने मुझे फंसा दिया
टूट कर बिखरा हूँ पर टूटने की आह नही की मैंने ।
कोशिश पूरी की लड़खड़ाते लड़खड़ाते जिंदगी में
तन्हा कहाँ कहाँ पड़ा हूँ ये किसी से नही बताया मैंने ।

सहारा अगर नही मिला कोई तो शिकायत क्या
खुद रो लिए हँस लिए पर किसी को रूलाया नही मैंने ।
सपनों ने मरने न दिया तो मौत से शिकायत क्या
आवारा कहाँ कहाँ भटका हूँ किसी से नही बताया मैंने ।

तुम और तुम्हारी दुनियां से परे जाने लगा हूँ मैं
दर्द को सहन कर जिंदगी जीना सीख लिया मैंने ।
आघोष में नही जिंदगी तेरे खिलाफ मौन हूँ
तूने कहाँ कहाँ मुझे पटका किसी से नही बताया मैंने ।

#दिगम्बर डंगवाल