इंसानी चैचाहट में चिड़िया कहीं गुल हो गयी
विकास की दौड़ में धरती धूल धूल हो रही
हर सुविधा मिल रही है आज रुपयों से मगर
इंसानियत चिड़िया की आवाज जैसी हो गयी ।

खेतों को छोड़ कर टिन के छतों में दुमक गयी
पेड़ो को भूल गयी तारों पर जिंदगी कट रही
गाँव को छोड़ शहर जबसे आके रहने लगा हूँ
जिंदगी टिन के नीचे बैठी चिड़िया जैसी हो गयी ।

शत्रु तरंगो जैसे घूम रहे है खुले आसमान पर
मैं पंख लिए भी छतों के नीचे कैद हो गयी
मैं ढंग से अपने पैर भी आंगन में नही फैलता
पड़ोसी की नजरें शहरी बाज जैसी जो हो गयी ।

कैसा विकास तुम ढूंढ रहे हो बाधाओ का
सांसे तक लेनी धरती पर दुष्वार हो गयी
सम्भल जाओ अभी वक्त है फिर न कहना
'इंसान' छत के नीचे बैठी गौरैया सी गुम हो गयी ।

#दिगम्बर डंगवाल