जिंदगी के देखो कैसे पैमाने बदल गए
हम इंसान से हिन्दू और तुम मुसलमान हो गए ।
यही मुद्दा बहुत है जिंदगी बशर के लिए
खाक-ए-शरीर कोई राख तो कोई दफन हो गए ।
यही मुद्दा बहुत है जिंदगी बशर के लिए
खाक-ए-शरीर कोई राख तो कोई दफन हो गए ।
दीवारें बनालो किलों सी अभेद मजहब की
कहीं हवा भी गलती से हकीकत न बयां कर दे ।
सच पे पर्दा बहुत जरूरी है जीने के लिए
फिर न कहना कि धर्म के ठेके कैसे बंद हो गए ।
बिगाड़ दो नस्लें अपनी कोई पीछे न रहे
छोड़दो इंसानियत और भूला दो जो मर गए ।
धर्म के काँटो में जकड़ लो खुद को इतना
हर धर्म बाकी रहे जो इंसानियत को खा गए ।
जरूरत भी बाकी नजर आती है आज
जरूरते इंसान जो नही, जरूरत धर्म हो गए ।
कर्म कितने ही गिरने क्यों न लग जाएं
हम धर्म से मौलवी और ईमान से पंडित जो हो गए ।
#दिगम्बर डंगवाल

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