अन्त: मन कल्ह के देखो भांडे फूट गए
अपना अपने करते भी सब यहीं छूट गए ।
जिंदगी भर की कमाई में बैठे हैं कोई और
शरीर संग गए थे, लोटे में राख बन लौट गए ।।

अपने भी क्षणभर में छूट के पराये हो गए
वर्षों से सजाए सपने भी चूर-चूर हो गए ।
जमीन पर अपनी जलना तक नसीब नही
शरीर संग गए थे, लोटे में राख बन लौट गए ।।

मैं-मैं ही रहा जब तक धरती से नही गए
जोड़कर तिनका तिनका घोसला बुनते गए ।
आज इंसान होने का सही मोल पता चला
शरीर संग गए थे, लोटे में राख बन लौट गए ।।

मेरी माया मेरा मोह सब धरे धरे रह गए
मैं नँगा आया था लोग नँगा ही मुझे ले गए ।
लाखों करोड़ों तो बस मन का बहम था मेरा
शरीर संग गए थे, लोटे में राख बन लौट गए ।।
#दिगम्बर डंगवाल