जिंदगी के पथ पर रोज दौड़ रहा हूँ
नही मालूम जीत रहा हूँ, हार रहा हूँ
हर श्वांस में पूरा दम लगा लौट गया
फिर भी कुछ छूट गया, फिर भी कुछ छूट गया ।

हर रिश्ते को दिल से निभा रहा हूँ
पग पग में सम्भल के चल रहा  हूँ
कोशिशों में जैसे मैं आज लुट गया
फिर भी कुछ छूट गया, फिर भी कुछ छूट गया ।

बाधाओं से मैं घिरता जा रहा हूँ
कोशिशों में उलझता जा रहा हूँ
पाटों के बीच दाने सा पिस गया
फिर भी कुछ छूट गया, फिर भी कुछ छूट गया ।

मन के अंतरों में बस झूल रहा हूँ
इंसानियत का मनका पलट रहा हूँ
गंठते गंठते धागे में जीवन बीत गया
फिर भी कुछ छूट गया, फिर भी कुछ छूट गया ।
#दिगम्बर डंगवाल