मन हर रोज एक नया ख्याल बुनता है
वहीं से फिर एक नया उन्माद छिड़ता है
रास्ते पर जब लगती मंजिल मुम्किन नही
एक कोशिश और कर, चुपके से कहता है ।
रास्ते पर जब लगती मंजिल मुम्किन नही
एक कोशिश और कर, चुपके से कहता है ।
बहुत कम ही अक्सर यह मेरी सुनता है
अपने ही ख्यालों के झरोखों में रहता है
कभी दूर बूंद पानी सा जब छलकता है
एक कोशिश और कर, चुपके से कहता है ।
मैं अकेला काफी हूँ ऐसा हौसला देता है
मेरी उदासी पर भी खामोश नही रहता है
हर रास्ते पर जब हार नजर आ जाती है
एक कोशिश और कर, चुपके से कहता है ।
यही तो मन जो सच्चा मीत है दुनियां मेरा
यही मेरी हार है और यही जीत का ताज है
हर दर्द को सुनकर जो अक्सर मौन रहता है
एक कोशिश और कर, चुपके से कहता है ।
#दिगम्बर डंगवाल

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