मेरे पहाड़ो का ठंडा पानी
धरा पर अमृत सा छलक रहा है
हरे चोले में सजी है धरती
मानो वर्षों से इसी की प्यास बुझा रहा है ।
हरे चोले में सजी है धरती
मानो वर्षों से इसी की प्यास बुझा रहा है ।
झरने के कल कल वाले सुर पर
मानो पंक्षी कोई धुन बजा रहे हों
रंग बिरंगी फूलों से सजी धरती पर
जैसे भौंरे एक सुर में श्रावण गीत गा रहे हों ।
चारों और बस उन्माद ही उन्माद है
और भोले के जयकारों का उल्लास है
बेलपत्र पेड़ की बेताबियाँ बढ़ी हुई है
भोले को जलाभिषेक कर मैं भी धन्य हो पाऊँ।
घटाओं का यह रूप ईश्वरीय है मानो
और झरनों का पहाड़ो पर जटाओं सा रूप है
हर कली जैसे उसका आभूषण सा बनी है
यही रूप निराला है मेरे पहाड़ो का ।
#दिगम्बर डंगवाल

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