हर दिन एक नई डगर लेकिन उस पर भी मगर,

हर कदम पर लोभ मेरा बनता रहा बाधा अगर,

कैसे होगी ये जीवन की तृष्णा पूरी ?

कब से फिर रहा हूँ मैं डगर-डगर, 

फिर भी ! मेरी तृष्णा को देखो लोभ के कैसे पंख लगे हैं ।


आजाद होकर भी ये भावनाओं की कैसी कैद है,

एक पथ की कामना पर हजार अर्चने क्यों ?

हर तृष्णा रूपी बीज पर लोभ का पत्थर है,

मैं प्रयासों में भी विफल, कैसे अंकुरित हो पाऊं ?

फिर भी ! मेरी तृष्णा को देखो लोभ के कैसे पंख लगे हैं ।


ये भी कम और दूसरा भी अधूरा सा ही लग रहा है,

बढ़ते हुए पैरों पर ये लोभ का मैल कैसा ?

जीवन की सच्ची तृष्णा को भेद रहा है लोभ मेरा,

ये पथ भी सुगम नहीं! पर आगे बढ़ रहा हूँ,

फिर भी ! मेरी तृष्णा को देखो लोभ के कैसे पंख लगे हैं ।


आज हर तृष्णा लोभ के वश में और मैं कैदी हूँ,

अब मेरी निष्ठ तृष्णा पर लोभ का पहरेदार है,

बोध है कि नश्वर शरीर के लिए जोड़ रहा हूँ,

और हर कर्म पर मेरी निष्ठा प्रश्न चिन्हित है,

फिर भी ! मेरी तृष्णा को देखो लोभ के कैसे पंख लगे हैं ।


#दिगम्बर डंगवाल